अल्लामा मौलवी इमाद-उद्दीन लाहिज़

Rev. Mawlawi Dr.Imad ud-din Lahiz

1830−1900

हर एक ज़बान इक़रार करे कि यसूअ मसीह ख़ुदावंद है

(इंजील मुक़द्दस ख़त फिलिप्पियों 2 बाब 11 आयत)

Every tongue acknowledge that Jesus Christ is Lord!

(Philippians 2:11)

तक़्लियाअ्त-उल-ताअ्लीक़ात

ये मुख़्तसर जवाब है मुंशी चिराग़ अली साहब की ताअ्लीक़ात का जो

अल्लामा मौलवी इमाद-उद्दीन लाहिज़ साहब

ने फरवरी 1869 में दर्मियान अमृतसर के लिखा और अब फ़ायदा आम के लिए

पंजाब रिलीजियस बुक सोसाइटी पंजाब के वास्ते छापी गई है।

Taqliat-ul-Taliqat

The Eradication of the Taliqat

A reply to Taliqat (Suspensions), a controversial work by Munshi Chiragud Din of Awadh called forth by the author’s Tawrikh-i-Muhammadi.

ताअ्लीक़ात-उल-ताअ्लीक़ात

दीबाचा

वाज़ेह हो कि मुंशी चिराग़ अली साहब ने मुल्क ऊदा में ज़रा जोश-ओ-ख़रोश के साथ इस्लाम की हिमायत के लिए तवारीख़ मुहम्मदी के बरख़िलाफ़ एक रिसाला लिखा है जिसका नाम ताअ्लीक़ात है। मैंने मुंशी साहब की बहुत तारीफ़ सुनी थी इसलिए इस रिसाले को इन अय्याम में मंगवा कर देखा ताकि मुंशी साहब के ख़यालात से कुछ फ़ायदा ऊठाऊँ मगर देखने से मालूम हुआ कि इस में कुछ भी नहीं है सिर्फ शोर ही था।

मुंशी साहब वही चाल चले हैं जो सब अहले इस्लाम अपनी तहरीर व तक़रीर में चलते हैं। इरादा था कि उन के फ़िक़्रे फ़िक़्रे पर कुछ मुनासिब बातें लिखूँ मगर इस काम की निस्बत ज़्यादा मुफ़ीद काम में मसरूफ़ हूँ पस मुफ़स्सिल जवाब की फ़ुर्सत ना पाकर ये मुख़्तसर जवाब लिखा जिसका नाम तक़्लियाअ्त-उल-ताअ्लीक़ात है। ताकि नाज़रीन कम इस्तिदाद (कम सलाहियत रखने वाले नाज़रीन) मुंशी साहब की चिकनी चटरी बातों से धोका ना खाएं क्योंकि उन्होंने ख़ूब ही मुग़ालते दिए हैं और उस ख़बर का मज़्मून कुछ-कुछ पूरा किया है कि अगर मुम्किन होता तो बर्गज़ीदों (चुने हुवो) को भी गुमराह करते। पर दुनियावी हिक्मत की क्या ताक़त है कि ईलाही हिक्मत का मुक़ाबला करे नामुम्किन है कि दीन-ए-ईसाई के सामने कोई दुनियावी मज़्हब ठहर सके क्योंकि ख़ुदा आप इस दीन का बानी और हिमायती है।

पहली बात

मुंशी साहब ने अपने रिसाले के शुरू ही में चंद अक़्वाल मग़रिबी मोअर्रिखों वग़ैरा के मुहम्मद साहब की निस्बत नक़्ल किए हैं जिनको वो मुहम्मद साहब की सेहत-ए-नबुव्वत की दलालत और मुख़ालिफ़ों की शहादत बतलाते हैं।

मेरे गुमान में ये बात मुहमल (बेमाअ्नी) है क्योंकि क़त-ए-नज़र इस के कि मुंशी साहब ने उन की राय का सहीह तर्जुमा किया है या नहीं मैं यूं कहता हूँ। कि इन अक़्वाल में से ऐसी कोई भी राय नहीं है जिससे मुहम्मद साहब की नबुव्वत साबित हो। किसी मुअर्रिख़ ने नहीं कहा कि वो अपने दावा-ए-नुबूव्वत को अपनी ज़िंदगी के वाक़ियात में ज़रूर साबित करते हैं। पर ये और बात है कि वो नेकी करना चाहते थे या अरब की बुत-परस्ती के दफ़ाअ (दूर करने में) में साईअ थे या एक बहादुर और उलुल-अज़्म (बुलंद इरादे वाले) शख़्स थे। इस में क्या शक है कि इन बातों में से बाअज़ राय दुरुस्त हैं मगर बंदे की राय ख़ास उन की नबुव्वत की निस्बत है और उन मोअर्रिखों की राय जिनका मुंशी साहब ने ज़िक्र किया है आम तौर पर है ख़्वाह बाएतबार दुनिया के और सिपाह सालारों के या उन के अख़्लाक़ के पस उन की राय और मुआमले में है और मेरी राय और मुआमला में है।

इस के सिवा ये बात है कि मैं इन मोअर्रिखों का मुक़ल्लिद नहीं हूँ मैंने मुहम्मद साहब के हालात पर ख़ुद ग़ौर की है और कुछ मेरे ज़हन में आया और मुहम्मदिया किताबों से मुझे मालूम हुआ वो सब रास्ती और नेक नीयती के साथ मैंने लिख दिया है कि मुहम्मद साहब हरगिज़ ख़ुदा के नबी ना थे। और कुछ हुआ करें, मुझे क्या हज़ार फ़ज़ीलतें दुनिया की इन में हों या ना हों मेरी बह्स तो सिर्फ नबुव्वत के मुआमला में है।

इलावा अज़ीं एक और बात है कि अंग्रेज़ी मोअर्रिखों की राय बेताम्मुल मैं हरगिज़ क़ुबूल नहीं कर सकता क्योंकि उन्होंने या तो अंग्रेज़ी तवारीख़ें पढ़ कर राय लिखी है या किसी किसी ने कुछ अरबी ज़बान भी पड़ी है और बाअज़ कुतुब सीरत भी देखी हैं और किसी मौलवी-साहब की मदद से कुछ अंग्रेज़ी में तर्जुमा भी कर दिया है। लेकिन उन्होंने मुहम्मदी ताअलीम की तासीरात अपने अंदर कभी नहीं देखीं ना मुहम्मदी मज़्हब के दक़ाइक़ से कभी वाक़िफ़ हुए क्योंकि वो कभी मुसलमान ना थे मैंने तो 35 बरस तक उन की ताअलीमात के दक़ाइक़ की तासीर को अपने में और अका़रिब में और बड़े बड़े मुहम्मदी मुअल्लिमों में मुहम्मद साहब का हल्क़ा-ब-गोश ग़ुलाम बन कर आज़माया और जब मैं हलाकत के क़रीब था ख़ुदा के फ़ज़्ल ने मुझे मसीह यसूअ में बचा लिया।

अब ख़्वाह हज़ार मग़रिबी मोअर्रिखों के लेक्चरों या किताबों के फ़ुक़रे चुन चुन कर कोई मुझे सुनाए मैं क़ुबूल नहीं कर सकता क्योंकि मैं इस मुआमला में ख़ुद बातजुर्बा हूँ मैं सच्च कहता हूँ कि इन की राय में बहुत गलतीयां हैं।

नाज़रीन को सोचना चाहीए कि अब मुसलमानों के पास मुहम्मद साहब की नबुव्वत पर और कुछ तो बाक़ी नहीं रहा मगर अहले लंदन के लेक्चरों के दम बुरीदा फ़िक़्रे अब वो लाकर सुनाते हैं साबिक़ (पिछले) ज़माने में आयात क़ुरआन पेश किया करते थे अब लेक्चरों के दरमयानी फ़िक़्रे मिस्ल ला तक़र्र्बू-सलात (لا تقربولصلوۃ) के पेश करके मुहम्मद साहब पर ईमान क़ायम कराना चाहते हैं पहले इन लेक्चर वालों से तो कहें कि मुहम्मद साहब को क़ुबूल क्यों नहीं करते देखो वो क्या सुनाते हैं और उन अपने फ़िक़्रों के क्या मअनी बतलाते हैं।

पर मुंशी साहब ने अपने फ़िक्राह पेश कर्दा के आख़िर में ये क्या ख़ूब फ़िक़्रह नक़्ल किया है कि (तुगटिया व कार्लेल और इस पर नीग्रो-अमारी व नोल्दीक व म्यूर साहिबान ने तमाम जहान पर ये बात अच्छी तरह साबित की है कि इस्लाम एक ज़िंदगी बख़्शने वाली चीज़ हज़ारों सूदमंद जौहरों से मशहून है और यह कि मुहम्मद साहब ने मुरव्वत की सुनहरी किताब में अपने लिए जगह हासिल की है।)

ये फ़िक़्रह मुंशी साहब ने लंदन के किसी क्वाटरली रिव्यू (Quarterly Reivew) के आर्टीकल से निकाला है। अब मैं जनाब मुंशी साहब ही को मुंसिफ़ बना कर पूछता हूँ कि क्या ये बात सहीह है और आप की तमीज़ इसे क़ुबूल करती है कि इस्लाम एक ज़िंदगी बख़्श चीज़ है? अहले इस्लाम में कुछ ज़िंदगी आपको नज़र आती है? ममालिक इस्लाम में कुछ ज़िंदगी है? अरब तुर्क ईरान काबुल वग़ैरा ममालिक-ए-इस्लाम का क्या हाल है ख़ुद हिन्दुस्तान में मशाइख़ व उलमा-ए-मुहम्मदिया का क्या हाल है इन में कुछ ज़िंदगी है? इस का जवाब आप ही ख़ुदा को दें साहब अहले इस्लाम ने तो कभी ज़िंदगी

यानी अच्छी बुरी बात के वह पहलु जो गौर करने से समझ में आएं।

“नमाज़ के क़रीब भी ना जाओ” (क़ुरआन की आयत)

का मुंह भी नहीं देखा हाँ अगर वह ज़िंदगी को चाहते हैं तो मसीह के कफ़्फ़ारे को और मुर्दों में जी उठने को मानें ईमान के वसीले से इस के साथ तक़र्रुब हासिल करें क्योंकि जिसके साथ बेटा है उस के साथ ज़िंदगी है जिसके साथ बेटा नहीं उस के साथ ज़िंदगी नहीं है। आदमी को इख़्तियार है कि जो चाहे मुंह से बोल उठे मगर हर बात का ख़ुदा को जवाब देना होगा।

हाँ दुनिया में ऐसा तो कोई भी मज़्हब नहीं है जिसमें कुछ भी अच्छी बातें ना हों सब झूटे मुअल्लिम (आलिम) अपनी बुरी ताअलीम पर उम्दा बातों का मुलम्माअ (सोने चांदी का पानी) चढ़ा कर सिखलाया करते हैं वर्ना उन की बात मुतलक़ क़ुबूल नहीं हो सकती है पर सच्चा दीन वो है जिसमें सब कुछ सच्च है। हाँ इस्लाम में एक जिस्मानी हरारत ज़रूर मौजूद है और इसलिए उस की निस्बत कोई कह सकता है कि वो जानदार चीज़ है पर रुहानी ज़िंदगी को इस से मतलब नहीं है अगर मुंशी साहब इस फ़िक़्रे को लिखने के एवज़ (बदले में) इस्लाम हज़ारों सोज़मंद जोहरों में से एक दो जोहरी निकाल के दिखलाते तो बेहतर था।

हासिल कलाम ये है कि लंदन के लेक्चरों और तवारीख़ के बाअज़ दुम बुरीदा फ़िक़्रों से नबुव्वत-ए-मुहम्मदी साबित नहीं हो सकती है क्योंकि वो कुछ चीज़ नहीं हैं इस्लाम की ज़ाती ख़ूबी दिखलाना चाहे, और मुहम्मद साहब की ख़ुश चलनी जिसका तवारीख़ ए मुहम्मदी इन्कार करती है ज़ाहिर करना चाहे, पर ये मुहाल (यानी मुम्किन नहीं) है अगर हो सकता तो अहले इस्लाम कभी दरगुज़र ना करते। इस के बाद मुंशी साहब ने 16 तअलीक़ीन लिखी हैं और अपनी सारी दुनियावी हिक्मत का ज़ोर लगा कर दीने ईसाई पर हमला किया है मैंने उन्हें भी देखा मगर एक तअ्लीक़ भी लायक़ ना पाई चुनान्चे जे़ल में मुख़्तसरन दिखलाता हूँ मगर पहले तीन बातें सुनाना मुनासिब है।

(1) मुंशी साहब ने अपनी हर तअ्लीक़ की इबारत में इस क़द्र जुमले मोअतरिज़ी भरे हैं कि उन की इबारत एक जंजाल हो गई। ये दुनियावी दानाई और इंशा (तहरीर की) परदाज़ी की ख़ूबी है पर मैं जुमले मोअतरिज़ों का जवाब बहुत ही कम दूंगा सिर्फ़ तअ्लीक़ के मंशा पर मेरी तवज्जा होगी।

(2) नाज़रीन को चाहीए कि अगर किताब मिल सके तो उन की हर तअ्लीक़ को पहले देख लें फिर तक़लीअ की मुख़्तसर इबारत पर ग़ौर करें।

(3) मुंशी साहब मेहरबानी करके बंदे से नाराज़ ना हों क्योंकि मैं ईज़ा देने की राह से नहीं मगर इन्साफ़ से रास्ती को ज़ाहिर करने के लिए ये बातें लिखता हूँ और मैं ख़ुद मुंशी साहब से बहुत ख़ुश हूँ कि उन्हों ने ताअ्लीक़ात लिखी जिससे अवाम पर भी ज़ाहिर हो गया कि मुहम्मदी आलिमों के पास तवारीख़-ए-मुहम्मदी के जवाब में यही कुछ था जो ताअ्लीक़ात में बयान हुआ इस का शुक्रिया सलाम के साथ मेरी तरफ़ से पहुचें।

पहली तअ्लीक़

इस तअ्लीक़ का नाम मुंशी साहब ने इमाद-उद्दीन की तल्बीस (मक्कारी) रखा है यानी इमाद-उद्दीन की मक्कारी या इमाद-उद्दीन का शैतानपन। यहां से ज़ाहिर है ताअ्लीक़ात की तस्नीफ़ के वक़्त मुंशी साहब के दिल में ग़ुस्सा है और ग़ुस्से वाले दिल में से जो बातें निकलती हैं अक्सर नारास्त होती हैं क्योंकि मुहक़्क़िक़ और हक़ीक़त के दर्मियान ये ग़ुस्सा मिस्ल पर्दे के हाइल हो जाया करता है।

तअ्लीक़ अव्वल का ख़ुलासा ये है

कि अहादीस के अक़्साम (मुख्तलिफ़ क़िस्में) और मुहद्दिसों के बयान इमाद-उद्दीन ने मह्ज़ फ़रेब और तल्बीस (मक्कारी) के तौर पर किए हैं क्योंकि इस ने उसूल इल्म हदीस के ज़ाबता के मुवाफ़िक़ अहादीस के रावियों पर बह्स नहीं की।

तौज़ीह

मुंशी साहब ने अहादीस और मुहद्दिसों का ज़िक्र तवारीख़ के अव्वल में पढ़ा तो उन्हें ये तवक़्क़ो हुई कि तवारीख़ का लिखने वाला मुसलमान मुज्तहिदिन की मानिंद हर हर हदीस को उसूल-ए-हदीस मुक़र्ररा अहले इस्लाम के मानिंद उस का दर्जा दिखला के लिखेगा यानी उसे पुराने दस्तूर के मुवाफ़िक़ वही उलमा मुहम्मदिया वाली चाल चलेगा।

तक़्लीअ

मैं हैरान हूँ कि मुंशी साहब को ऐसी तवक़्क़ो कहाँ से पैदा हुई? जिसके बरना आने के सबब हदीसों के अक़्साम (मुख्तलिफ़ क़िस्में) सुना कर इमाद-उद्दीन मक्कार बन गया। देखो तवारीख़ के अव्वल में एक दीबाचा है जिसमें तीन सबब तालीफ़ और माख़ज़ तालीफ़ का ज़िक्र है और तौर-ए-अख़ज़ का भी मुफ़स्सिल बयान है। अब वो कौन आदमी है जो ये दीबाचा पढ़ के ये तवक़्क़ो पैदा करेगा जो मुंशी साहब को पैदा हुई। दूसरी बात ये है कि जब हदीसों का बयान शुरू हुआ तो उसके अव्वल में क़रीब दो सफ़ा तक जो लिखा है वो ये है किअहादीस का सिलसिला जिसको मुसलमान सनद कहते हैं वो ख़ुद सनद का मुहताज है। पस इस में बह्स करना वक़्त को ख़राब करना है। अब ये इबारत उस की तवक़्क़ो पैदा नहीं करती है या मुतलक़ दफ़ाअ करती है पस तवारीख़ से तो ये तवक़्क़ो पैदा नहीं होती है पर अपने ज़हन से मुंशी साहब ये तवक़्क़ो निकाल के बे-मुनासिब इल्ज़ाम देते हैं। तीसरी बात सर-ए-वर्क़ पर लिखा है कि ये तल्ख़ीस अल- अहादीस का पहला हिस्सा है दीबाचे में लिखा है कि ये किताब ख़ुलासा है रोज़तुल-अहबाब का जो अहले इस्लाम में मुसल्लम (तस्लीम-शुदा) किताब है यहां से साफ़ मालूम होता है कि अहादीस और मुहद्दिसीन का ज़िक्र शायद दूसरे हिस्से में कार-आमद होगा क्योंकि वहां ताअलीम का ज़िक्र आता है और चूँकि ताअलीम नाक़िस है इसलिए ज़रूर है कि हदीस का दर्जा भी साथ ही दिखलाया जाये और पहले हिस्से में अहादीस व मुहद्दिसीन का ज़िक्र करके इतना कहना बस था कि मुहम्मदी तवारीख़ अहले इस्लाम ने इन सब क़िस्म की रिवायतों से तालीफ़ की है।

मुंशी साहब तवारीख़ मुहम्मदी के लिए इसे इस्तिख़्राज (निकालन देने) की तवक़्क़ो क्यों करते हैं? ये तवक़्क़ो तो अब दुनिया में से उठ गई है। ना कोई अहले इस्लाम ऐसा कर सकता है ना ग़ैर। ठीक तवारीख़े मुहम्मदी वही है जो मुहम्मदी उलमा मशाहिर लिख के हाथ में दे गए हैं जिसका ख़ुलासा बंदे ने निकाला है।

2 तअ्लीक़

मुअल्लिफ़ ने जिस झुर्फ़ (गहरी) निगाही से इल्म हदीस पर नज़र डालना मुनासिब समझा था तो क्या उस की मुनासिब की रिआयत की है? यानी नहीं की।

2 तक़्लीअ

इस तअ्लीक़ में जो कुछ मुंशी साहब ने लिखा है बेफ़ाइदा है क्योंकि यही मतलब उन की तअ्लीक़ अव्वल का भी था हाँ लफ़्ज़ जुदा (अलग) बोले हैं और कुछ बातें और भी लिखी हैं जो तअ्लीक़ से इलाक़ा (ताल्लुक़) नहीं रखतीं सब बातों का मुख़्तसर जवाब ये है कि तवारीख़े मुहम्मद सफ़ा 6 सतर 11 से 15 तक देखें कि लिखने का तर्ज़ क्या इख़्तियार किया गया है और इसी तर्ज़ की क्या ज़रूरत बतलाई गई है पस जिस मतलब से वो तर्ज़ इख़्तियार किया गया है वो पूरा करना ज़रूर है मुंशी साहब को ये कहना जायज़ नहीं है कि मुख़ालिफ़ इस तरह से क्यों एतराज़ करता है और इस तरह से क्यों नहीं करता मुख़ालिफ़ को इख़्तियार है जिस तरह से चाहीए एतराज़ करे और मुजीब (जवाब देने वाले) को भी मुनासिब है कि एतराज़ के मुवाफ़िक़ जवाब दे जिन बातों को मुंशी साहब बद-गुमानियाँ और झूटे एतराज़ और बातिल शुब्हात बतलाते हैं इन में से एक बात का भी जवाब उन्हों ने नहीं दिया इन बातों का बुतलान (बातिल) साबित करना मुनासिब था बे-दलील उन्हें बातिल (ग़लत) बतलाना जायज़ ना था ताज्जुब की बात है कि मुंशी साहब उन्हें बे-दलील बातिल बतलाते हैं हालाँकि जिन बातों को वो बातिल शुब्हात कहते हैं उनके साथ दलाईल भी मज़्कूर हैं पर जवाब में सिर्फ दावा ही दावा है बे-दलील।

ِِْ

ये कैसी बात है कि एतराज़ बादलील (दलील के साथ) के मुक़ाबला में जवाब बे-दलील (बगैर दलील) सुना कर मुंशी साहब इमाद-उद्दीन की बे-ज़ाबतगी और बे-राहरवी साबित करते हैं। हाँ ख़ूब याद आया कि मुंशी साहब ने दो दलीलें भी यहां पर सुनाई हैं पहली दलील उन की ये है कि ईसाई मोअल्लिफ़ बेइल्म और बेवक़ूफ़ होते हैं और दूसरी दलील ये है कि ईसाई ज़बान दराज़ लोग होते हैं।

मगर ये उन की दोनों दलीलें इमाद-उद्दीन की बेराह-रवी साबित नहीं कर सकतीं जब तक कि मताइन के पूरे जवाब मुंशी साहब ना सुनादें।

भला साहब हमने फ़र्ज़ किया कि ईसाई लोग नादान कम-अक़्ल बेइल्म और हिर्स व होस् में मुब्तला हैं और इसलिए मुहम्मद साहब पर क़ुरआन हदीस से निकाल के बेजा एतराज़ किया करते हैं और आप की असल असील और माख़ज़ जलील फ़न व रिवायत के उसूल व क़वाइद के मुवाफ़िक़ इस्तिदलाल नहीं करते और उन की तस्नीफ़ात का मंशा बक़ौल आपकी अदम इत्तिला और क़िल्लत मालूमात (कम इल्मी) है और इसी तरह से तवारीख़े मुहम्मदी भी एक नादान आदमी ने लिख मारी।

तो क्या इस का जवाब यही है कि आप हमें मोटी मोटी अरबी के अल्फ़ाज़ ही बोल कर सुना दें और हज़ार एतराज़ों में से एक का भी जवाब ना दें?

अगर हम लोग क़वाइद व जवाबिता (उसूल) इस्लामीया के पाबंद हो के एतराज़ नहीं करते तो आप ही हमें अपने क़वाइद के मुवाफ़िक़ इस्तिदलाल कर के जवाब दे दिया करें। मैंने तवारीख़-ए-मुहम्मदी में जाबजा अपने गुमान में मुनासिब एतराज़ भी बहुत से किए हैं इस उम्मीद से कि उनका कुछ जवाब आप लोगों से सुनूँ मगर जवाब में मैंने सिर्फ ये लफ़्ज़ आपसे सुने। झुर्फ़ निगाही, ज़वाबिता व क़वाइद, मुस्तनदात मताइन, तशनेआत, बातिल शुब्हात, असल असील माख़ज़ जलील वग़ैरा। ऐसी बातों को हम लोग अरबी खवानों की दहमकियां जानते हैं। और जिस इल्म हदीस को मुंशी साहब फ़न अज़ीमुश्शान बतलाते हैं हम उसे बुड्ढों की कहानियां जानते हैं और उस का चंदाँ एतबार भी नहीं करते बार-बार मुंशी साहब ने हमारी किताबों में पढ़ा होगा कि हदीस कुछ नहीं है उसने हज़ारों रूहों को बर्बाद किया है सिर्फ ख़ुदा का कलाम इन्सान के लिए बस है और वो हदीस का मुहताज नहीं है जैसे क़ुरआन हदीस का मुहताज है।

इसी हदीस की पाबंदी से यहूदी गुमराह हुए और इसी से रोमन कैथोलिक लोग बुत-परस्ती में फंस गए अगर मुंशी साहब इस फ़न को अज़ीमुश्शान और एक उम्दा चीज़ जानते हैं और इस में बेहतर का दावा रखते हैं तो पहले चाहीए कि तमाम कुतुब अहादीस में से इंतिखाब करके एक सहीह हदीसों की किताब अपने ज़वाबत और क़वाइद (उसूल) के मुवाफ़िक़ तैयार करें और तमाम ज़मीन के उलमा इस्लाम से इस की तस्दीक़ करवाएं और फिर इश्तिहार दें कि अगले अहले इस्लाम कुतुब साबिक़ा की पाबंदी करके ग़लती में मर गए अब हम तेरहवीं सदी में कामिल मुहक़्क़िक़ और इस्लाम की मरम्मत करने वाले पैदा हुए हैं चाहीए कि क़ुरआन और हमारी ये नई किताब इस्लाम और बानी इस्लाम के बारे में मोअतबर (भरोसे के लायक) समझी जाये और सब कुतुब साबिक़ा में रतब व याबस बहरे हैं।

ये कैसी शर्म की बात है कि मुंशी साहब अपना बोझ मुख़ालिफ़ पर डालते हैं उस की इस तअ्लीक़ का हाल यही है कि ख़बरदार कोई आदमी इस्लाम पर एतराज़ ना करे अगर करे तो इल्म हदीस का आलिम व फ़ाज़िल हो के उन के क़वाइद व ज़वाबते (उसूल) के मुवाफ़िक़ करे वर्ना इसे जवाब ना मिलेगा या जाहिल व ज़बान दराज़ कहा जायेगा और अरबी के मोटे मोटे लफ़्ज़ उसे सुनाए जाएंगे।

3 तअ्लीक़

मुअल्लिफ़ को ख़ास अपने एतराज़ वाली हदीसों के अस्नाद पर बाला नफ़राद नज़र चाही थी ना कि रोज़तुल-अहबाब और मदारिजु-न्नबुव्वत में लिखा है।

3 तक़्लीअ

ये वही बात है कि मेरा वाजिब तुझे अदा करना चाहीए था साहब अगरचे मुअल्लिफ़ ने एतराज़ वाली हदीसों की अस्नाद पर बाला-इन्फ़िराद नज़र करके एतराज़ नहीं किया बल्कि उन को आप की मोअतबर हदीसें जानकर एतराज़ कर दिया और ये उस की ग़लती हुई तो आप उनकी अस्नाद पर बाला-इन्फ़िराद नज़र करके एतराज़ात को दफ़ाअ करते जिससे मोअल्लिफ़ की ग़लती साबित होती इस ने तो आप को जवाब का अच्छा मौक़ा दिया था मगर आप कुछ नहीं कर सकते क्योंकि वो हदीसें ज़रूर साबित हैं।

मैंने तो पहले ही कह दिया था कि अहले इस्लाम के अस्नाद का तरीक़ा ही नाकारा है देखो (तवारीख़ मुहम्मदी सफ़ा 9 सतर 3 से 8) पर इस नाकारा क़ायदे का इस्तिमाल ही आप मुझसे तलब करते हैं मेरा इतना बतलाना बस है कि अहले इस्लाम के उलमा अपने मुहम्मद साहब का अहवाल यूं सुनाते हैं और उस पर हम यूं एतराज़ करते हैं। ये हमारा काम हरगिज़ नहीं है कि हम इन अहादीस के अस्नाद पर बाला नज़र अद नज़र करें उलमा इस्लाम जो आपके फ़न व रिवायत को ख़ूब जानते हैं और इस्लाम में बड़ी एहतियात के लोग गिने जाते हैं जब उन्हों ने बाद तन्क़ीह इन रिवायत को अपनी किताबों में दर्ज कर लिया है तब उन की किताबों में दिखलाना हमारी तरफ़ से काफ़ी है ताज्जुब की बात है कि मुंशी साहब के नज़्दीक रोज़तुल-अहबाब और मदारिजु-न्नबुव्वत कुछ मोअतबर चीज़ नहीं हैं और मौलवी रहमत-उल्लाह साहब जो हक़ीक़त में इस वक़्त अहले इस्लाम के एक मस्तादाद और मोअतबर आलिम हैं इन किताबों को मोअतबर बतला के हमारे सामने पेश करते हैं।

और रोज़तुल-अहबाब का मुअल्लिफ़ अपनी तालीफ़ का माख़ज़ यूं बतलाता है कि :-
از کتب تفاسیر وسیر وحدیث وموالید وتواریخ انچہ ثبوت پیوستہ از سیرت

حضرت ومقدمات وممتمات وماتیعلق بہاوازاحوال مشاہیر اہل البیت وصحابہ وتابعین

وتبع تابعین وایئہ حدیث الخ۔

फिर शाह अब्दुल हक़ मुहद्दिस देहलवी ने निहायत एहतियात के साथ अपने गुमान में सहीह इस्तिख़्राज करके उसे रोज़तुल-अहबाब वग़ैरा से अपने मदारिजु-न्नबुव्वत लिखी है। और यह दोनों मुअल्लिफ़ ऐसे मोअतबर मुहम्मदी आलिम हैं कि मुंशी साहब और दीगर उलमा मुहम्मदियह जो इस वक़्त हिन्दुस्तान में हरगिज़ उन के हम-पाया नहीं हैं फिर मुंशी साहब क्योंकर इन किताबों को हक़ीर बतलाते हैं।

हम ये कहते कि तवारीख़ मुहम्मदी के लिखने में जिस इस्तिख़्राज की उम्मीद मुंशी साहब हमसे रखते थे उन की उम्मीद का मंशा उन मोअल्लिफ़ों ने पूरा करके अपनी किताबें लिखी हैं और इसलिए मैंने उन की किताबों को अपना माख़ज़ बनाया है। ये क्या बात है अपने बुज़ुर्ग आलिमों के इस्तिख़्राज को हक़ीर जानते हैं और ख़ुद इस्तिख़्राज की ताक़त नहीं रखते और ईसाईयों को तक्लीफ़ देते हैं कि वो उन के लिए इस्तिख़्राज जदीद से दीन मुहम्मदी को साबित करें।

मैंने तवारीख़ लिखते वक़्त अगरचे कई किताबों पर नज़र रखी है ख़ुसूसुन इस अरबी किताब पर भी जो शिफ़ा और उस के शुरू मोअतबरा से हशामी-ओ-शामी और हलबी वग़ैरा से सेहत के साथ इंतिखाब करके एक मशहूर आलिम अहमद वहलान ने 1278 हिज्री में दर्मियान मदीना शहर के लिखी है जिसका नाम सीरत-उन्नबी है और 1285 हिज्री में दर्मियान दो जिल्द के शहर-ए-मिस्र में छापी गई है तो भी मैंने उस का हवाला इसलिए नहीं दिया कि आम लोगों को वो किताब हर कहीं हाथ नहीं आ सकती है पर ये फ़ारसी किताबें मोअतबर मुहम्मदी बुज़ुर्गों की हर कहीं मिल सकती हैं और यह दोनों किताबें इत्र (ख़ुलासा) हैं तमाम सैर की किताबों का।

क्या मुंशी साहब शाह अब्दुल हक़ मुहद्दिस देहलवी से भी बड़े मुहक़्क़िक़ हैं? क्या उन की निस्बत ज़्यादा एहतियात के शख़्स हैं? या इल्म हदीस व सैर में उस से ज़्यादा वाक़िफ़ हैं? फिर क्या उस से ज़्यादा इस्लाम के हिमायती हैं? इस का इन्साफ़ नाज़रीन की तमीज़ कर सकती है पस जबकि इस्लाम के मोअतबर हिमायती ने जो ख़ुद मुहद्दिस है और जिसकी ख़ूशिया चीनी सब उलमा हिंद करते हैं रोज़तुल-अहबाब को मोअतबर माख़ज़ जान के अपने मदारिज उस से लिखी है तो हमारे लिए बह्स के मुक़ाम पर और कोई भी किताब ऐसी मोअतबर नहीं हो सकती जैसी रोज़तुल-अहबाब है।

मुंशी साहब इतनी दर्द सिरी नाहक़ करते हैं जबकि सिर्फ क़ुरआन से जो इस्लाम में सब फ़िर्क़ों की मुत्तफ़िक़ अलैह किताब है ये बात ख़ूब साबित हो चुकी है कि मुहम्मद साहब ख़ुदा की तरफ़ से रसूल ना थे और कि उनका चलन क़ुरआन से हरगिज़ अच्छा साबित ना हुआ और उन की ताअलीम में नुक़्सान पाया गया चुनान्चे हिदायत-उल-मुस्लिमीन की आख़िरी फसलों में बयान हो चुका है जिसका जवाब मुंशी साहब ने अब तक नहीं दिया तो फिर हमें हदीसों में जो पीछे कलमबंद हुई हैं इतनी बड़ी तहक़ीक़ात की क्या ज़रूरत है जो कुछ उन के बुज़ुर्गों की किताबों में देखते हैं वही हम भी नेक नीयती से दिखलाते हैं जनाब मुंशी साहब अपना ही पैसा खोटा तो परखने वाले का क्या दोश।

बाक़ी इस पर नेग्र साहब का क़ौल जो आप ने नक़्ल किया है अगर आपको पसंद है तो मानें मैं तो उसे नादुरुस्त जानता हूँ क्योंकि ख़िलाफ़ अक़्ल भी है शायद मुंशी साहब ने दुरुस्त तर्जुमा ना किया होगा।

क्या कोई मुंसिफ़ हाकिम किसी मुक़द्दमे में मुतअद्दिद (बहुत से) गवाहों की गवाही को रद्द करके सिर्फ अपने ख़्याल पर या एक की गवाही पर जो सब के ख़िलाफ़ है फ़तवा दे सकता है? हरगिज़ नहीं।

लतीफ़ा ये है कि मुंशी साहब अपने उसूल-ए-हदीस पर बहुत ज़ोर देते हैं और फिर इस पर नेग्र साहब का क़ौल जो उसूल-ए-हदीस के ख़िलाफ़ है पेश करके उस की तामील भी करवाना चाहते हैं। तर्क़ मुतअद्दिदह (बहुत से रास्ते) से जो हदीस आती है उसूल उसे मोअतबर हदीसों में शुमार करता है इस पर नेग्र साहब का क़ौल उस के ख़िलाफ़ है।

मुंशी साहब की इस तअ्लीक़ सोम का मंशा ये है कि जो जो मुक़ाम मौरिद एतराज़ थे उन की अस्नाद पर मुअल्लिफ़ को बाला-इन्फ़िराद नज़र चाहीए थी और जो मुक़ाम मौरिद एतराज़ ना थे उन्हें यूँही नक़्ल करता चला जाता तो मज़ाइक़ा ना था यानी मेरी भलाइयों को बे तामुल क़ुबूल कर ले और मेरी बुराईयों पर किसी तरह तावीलात का पर्दा डाले पर ये मुंसिफ़ आदमी से कब हो सकता है ये एतराज़ मुंशी साहब का उन्हीं के बुज़ुर्गों पर आयद है ना उस पर जो उन के अक़्वाल नक़्ल करता है।

4 तअ्लीक़

इस तअ्लीक़ में वही बात है जो ऊपर की तअ्लीक़ में मुंशी साहब ने बयान की है किताब बढ़ाने को वही बात फिर दूसरी इबारत में लिख दी है।

4 तक़्लीअ

इस तअ्लीक़ का जवाब भी वही है जो ऊपर बयान हुआ हाँ एक बात इस में नई है कि रोज़तुल-अहबाब को मुंशी साहब ने एक क़िस्से की किताब बतलाया है। मैं भी ऐसी ही समझता हूँ कि सब मुहम्मदी किताबें क़िस्सा हैं पर ताअ्लीक़ात क़िस्सा नहीं है वो क़िस्से पर झगड़ा है पर झगड़े का फ़ैसला मैं यूं करता हूँ कि मुहम्मदी आलिमों ने मुहम्मद साहब के बहुत से क़िस्से सुनाए हलबी हशामी वाक़िदी वग़ैरा भी लेकिन इन सब क़िस्सों में से इंतिखाब किया हुआ एक क़िस्सा रोज़तुल-अहबाब भी है और उस क़िस्से में यूं यूं लिखा है और उस पर हमारे ये एतराज़ हैं उनका जवाब कोई मुसलमान देवे। मुंशी साहब यूं जवाब देते हैं कि। रोज़तुल-अहबाब ग़ैर मोअतबर क़िस्सा है हम कहते हैं कि जो बातें रोज़तुल-अहबाब में लिखी हैं वही बातें अदना फ़र्क़ के साथ सब कुतुब सैर (सीरत) में लिखी हैं अगर रोज़तुल-अहबाब की बातें ग़ैर-मोअतबर हैं तो कुल किताबें इल्म सैर की भी ग़ैर-मोअतबर हैं क्योंकि सब का बयान यकसाँ है।

पहले तो मुंशी साहब इस क़िस्से को माने बैठे थे जब इस पर एतराज़ सुने तो मोअतरिज़ (एतराज़ करने वाले) से झगड़ा करने को उठे और झगड़ा यूं करते हैं कि हमारे बुज़ुर्ग झूट सच्च सब कुछ लिखते आए हैं तुम सुनने वालों को चाहीए कि जहां तक एतराज़ वारिद ना हो मान लिया करो और जहां एतराज़ की जगह आए उस की सेहत में फ़िक्र करो और तहक़ीक़ यूं करो कि ख़ुद मुहद्दिस बनों और मुहम्मद साहब की निस्बत नेक गुमान करके तावीलात करो क्योंकि वो फ़र्ज़न भले हैं।

मुंशी साहब की तहरीर से एक अच्छा ख़्याल मेरे ज़हन में आया कि अगर ख़ुदा फ़ुर्सत बख़्शे तो सिर्फ क़ुरआन से एक तवारीख़ मुहम्मदी निकालना चाहीए पर वो भी तवारीख़ मुहम्मदी के निस्बत अहले इस्लाम के लिए ज़्यादा मुज़िर होगी और वहां भी मुंशी साहब एक झगड़ा कर सकते हैं कि इस आयत की इस तफ़्सीर को ना मानो उस तफ़्सीर को मानो।

5 तअ्लीक़

मुअल्लिफ़ ने अर्बाब सैर का ज़िक्र नहीं किया मुहद्दीसीन का ज़िक्र किया है जो फुक़हा के तौर पर अहादीस की तर्तीब करने वाले हैं।

5 तक़्लीअ

मुहद्दिसीन का ज़िक्र जो दीबाचे में है वो दूसरे हिस्से की रिआयत से लिखा गया है जो फुक़हा या ताअलीम मुहम्मदी है और वह तस्नीफ़ तो हो चुका है पर अब तक छपा नहीं, उम्मीद है कि अब छपेगा और अर्बाब सैर की फ़हरिस्त इसलिए नहीं लिखी गई कि तवारीख़ मुहम्मदी कोई नई किताब नहीं है वो इंतिखाब और ख़ुलासा है ख़ास एक मोअतबर मुहम्मदी किताब का पस ये तअ्लीक़ भी मुंशी साहब की नाजायज़ है।

6 तअ्लीक़

हदीसों का मर्तबा नहीं दिखलाया कि कौनसी मोअतबर और कौनसी कम मोअतबर हैं और अपनी किताब के मज़ामीन हर क़िस्म के साथ मंसूब करके नहीं बतलाई।

6 तक़्लीअ

हदीसों के मरातिब एतबार उन की तारीफ़ात से जो मज़्कूर हैं ख़ुद ज़ाहिर हैं फ़ुज़ूल इबारत बढ़ाने से क्या फ़ायदा था और जिस मतलब से अहादीस का ज़िक्र आया है जहां वो मतलब आएगा यानी हिस्सा दोम में तो वहां ताअलीमात को किसी ना किसी हदीस की तरफ़ आप मंसूब ही पाएंगे क्योंकि ताअलीम मुहम्मदी की बह्स इस बात की मुहताज है अहले इस्लाम के लिए। पर तवारीख़े मुहम्मदी के मज़्मून इस इंतिसाब (ताल्लुक़) के मुहताज ना थे क्योंकि वो ख़ुलासा और इंतिखाब है एक अहले इस्लाम की उम्दा किताब का।

7 तअ्लीक़

मुहम्मद साहब का अहवाल दर्याफ़्त करने के लिए सिर्फ दो माख़ज़ हैं यानी क़ुरआन और हदीस।

7 तक़्लीअ

इन्हीं दो माख़ज़ों से तवारीख़-ए-मुहम्मदी लिखी गई है पर मैंने आप जुर्आत करके उन माख़ज़ों में हाथ भी नहीं डाला इस ख़्याल से कि मुहम्मदी लोग यूं ना कहें कि तूने इनाद के तौर पर अख़ज़ किया है पर मैंने एहतियात की राह से अहले इस्लाम के बुज़ुर्गों के अख़ज़ से इंतिखाब किया और ये दिखलाया कि मुहम्मद साहब के हालात की जो दो मोअतबर माख़ज़ हैं यानी क़ुरआन और हदीस उन से ख़ुद मुहम्मदी बुज़ुर्गों ने ये अख़ज़ किया है और ख़ुद मुहम्मदियों ने हमें ये अख़ज़ दिया है इस पर हमारे ये एतराज़ हैं जिनके जवाब से वो लाचार हैं।

कोई तीसरा माख़ज़ मैंने नहीं बनाया मगर ख़ुद मुंशी साहब ने अपने ताअ्लीक़ात में एक तीसरा माख़ज़ भी दिखलाया है यानी अंग्रेज़ों के क़ौल जो ना हदीस हैं ना क़ुरआन।

8 तअ्लीक़

जनाब सैर म्यूर साहब लिखते हैं कि मुहद्दिसीन अपने काम में दयानतदार थे लेकिन इमाद-उद्दीन उन्हें बेदियानत बतलाता है और उन की बात का एतबार नहीं करता।

8 तक़्लीअ

साहब मैं उन्हें उन के काम में हरगिज़ बेदियानत नहीं कहता और चोर या जालसाज़ भी हरगिज़ नहीं बतलाता।

मगर ये कहता हूँ कि ये फ़न ही नाकारा शै है जिन क़वाइद उसूलिया अपने से उन्हों ने बड़ी मेहनत और दियानत के साथ तहक़ीक़ की है। वो क़वाइद ही ऐसे नहीं हैं कि आदमी को ग़लती से बचाएं देखो तवारीख़े मुहम्मदी 9 सफ़ा सतर 3 से 8

9 तअ्लीक़

(1) मुतवातिर और मोअतबर अख़बारात (ख़बरों) ही से तवारीख़ें जहाँ की लिखी गई हैं।

(2) अख़्बार अहाद भी कुछ मुफ़ीद हैं।

(3) तअद्दुद (बहुत से) तरीक़ अहादीस भी अस्नाद की बनावट को बातिल करता है।

(4)ऐसा शुब्हा जुज़्व वाहिद पर हो सकता है ना सब क़िस्म की हदीसों पर।

9 तक़्लीअ

बेशक मुतवातिर (यानी जिन ख़बरों के बयान करने वाले बहुत ज़्यादा हो) व मोअतबर बल्कि हर क़िस्म के अख़बारात से तवारीख़ें दुनिया में लिखी जाती हैं और बादशाहों के हालात इसी तरह से क़लम-बंद होते हैं और यह भी सच्च है कि अख़बारात अहाद (यानी बहुत की कम बयां करने वाले एक दो रावी) भी किसी क़द्र मुफ़ीद हैं। मगर ये सब इल्म जो इस तरीक़े से हासिल होता है। इस के यक़ीन का एक और ही आम दर्जा है जिसमें एहतिमाल सिदक़ व कज़ब (सच और झूठ) क़ायम रहता है अस्नाद में या वारदात के वक़ूअ में या नहज (अंदाज़) वक़ूअ में इम्कान ग़लती के सबब से। और इसी सबब से मुंशी साहब इल्म-ए-सीर में ख़ुद रतब व याबस के क़ाइल हैं पस इसी तरह सब बादशाहों के तवारीख़ें भी जो उनका इल्म सैर है रतब याबस से बचा हुआ नहीं है।

पर वो इल्म और वह अख़बारात (ख़बरें) या वो इल्म सैर जिस पर इन्सान की रूह की ज़िंदगी का मदार है यानी दीनयात के वाक़ियात इस दुनियावी तवारीख़ात के मर्तबा की मालूमात नहीं होती हैं तवारीख़ात

मुतावात्तिर- हदीस, रिवायत या ख़बर उसको कहते है जिसके बयान करने वाले बहुत ज़्यादा हो और इन सब बयान करने वालों का झूट पर मुत्तफ़िक़ (एकमत) हो जाना आदतन नामुम्किन हो और यह की बयान करने वाले रावियों से इत्तिफ़ाक़न भी झूठ ना निकले इन खूबियों वाली हदीस या खबर को “मुतावात्तिर” कहते हैं।

अख़्बार अहाद - यानी वह हदीस या खबर जिसके रावी यानी नक़्ल करने वाले या बयान करने वाले बहुत ही कम तादाद में हो, यानी जिनकी तादाद एक दो ही हों या जिनकी तादाद दस (10) तक भी ना पहुंचती हो।

के यक़ीनियात की निस्बत ये यक़ीनियात दीनियाह ज़्यादा तर सबूत के मुहताज हैं क्योंकि रूह की आबादी या बर्बादी के मौक़ूफ़ अलैह हैं।

यहां मोअतबर गवाहों के दीद (देखने) और शनीद बिला-वास्ता और उन की अपनी तहरीर और ज़बरदस्त तहरीर दरकार है ना आम तवारीख़ों के मुवाफ़िक़। देखो मुंशी साहब मुहम्मदी दीन के उलूम या हालात को दुनिया के दीगर उलूम तवारीख़यह के मानिंद बतलाते हैं मैं उसे मानता हूँ क्योंकि ऐसा ही है लेकिन दीने ईसाई के उलूम इल्म तवारीख़ के आम दर्जे से ज़्यादा तर मुम्ताज़ यक़ीनात हैं और उन्ही की निस्बत मुहम्मदी दीन के वाक़ियात के यक़ीनात को हम कमतर बतलाते हैं।

ईसाई दीन के यक़ीनात मोअतबर गवाहों की दीद (देखने) और शनीद और उन की अपने तहरीरात से जो निहायत ज़बरदस्त तहरीर है ये उलूम मसीहियह इस आला दर्जे को पहुंचे हुए हैं कि कामिल यक़ीन रूह में पैदा करके एहतिमाल किज़्ब (झूठ) का मुतलक़ दफ़ाअ करते हैं और सिदक़ (सच्चाई) का ना सिर्फ एहतिमाल दिखलाते हैं मगर ऐनुल-यक़ीन बख़्शते हैं।

फिर मुंशी साहब कहते हैं कि तअद्दुद (बहुत से) तर्क भी अस्नाद की बनावट को बातिल करता है ये सच्च बात है मगर मैंने नहीं कहा कि अस्नाद का तरीक़ा मुतलक़ बातिल है पर अहले हदीस के अस्नाद के तरीक़े पर मेरा एतराज़ है मैं जानता हूँ कि वो शुनीद है बाल-वास्ता और एहतिमाल सिदक़ व कज़ब (यानी शक सच और झूट होने) का जाता नहीं रहता है।

और तअद्दुद (बहुत से) तर्क अगरचे सनद में कुछ जान डालता है तो भी नफ़्स हदीस बामतन हदीस की सक़्म (खराबी) को दूर नहीं कर सकता और वह हदीसें जो तअद्दुद (बहुत से) तर्क से साबित हैं निहायत कम हैं और यह कुछ बात भी नहीं है।

फिर मुंशी साहब फ़रमाते हैं कि बनावट का शुब्हा जुज़-वाहिद पर हो सकता है ना हर क़िस्म की हदीस पर।

जवाब ये है कि हर क़िस्म की हदीस हदीस है और हर हदीस अगर ज़्यादा से ज़्यादा फ़ायदा बख़्शे तो वही दर्जा दिखला देगी जो इल्म तवारीख़ का दर्जा है और आलम-ए-तवारीख़ के दर्जे पर तो हम अहादीस मुहम्मदिया को मान सकते हैं और इसी वास्ते हमें यक़ीन भी कुछ है कि मुहम्मद साहब की तवारीख़ यही है जो बंदे ने लिख दी है।

पर फ़ज़ीलत में मुबालग़ी और मोअजज़ात का बयान अगरचे मुहद्दिसीन करते हैं पर वो दूसरी क़िस्म के दलाईल से रद्द किए जाते हैं ना सिर्फ हदीस होने के सबब से अगरचे एक सबब ये भी है।

10 तअ्लीक़

मुहम्मद साहब के मोअजज़े तीन क़िस्म के हैं क़ुरआनी जो क़ुरआन से साबित हैं तवातरी जो अहादीस मुतवातिरह से साबित हैं अहादी जो रिवायत अहाद से साबित हैं हर अक़्लमंद इस बात को मानेगा।

पर मोअजज़ात के रद्द में इमाद-उद्दीन ने जो 6 दलीलें सुनाई हैं उन्हीं में से (3,4,5) दलील अख़्बार अहाद पर वाक़ेअ है ना दूसरी क़िस्म की अहादीस पर।

और (1,2,6) दलील तवारीख़ी वाक़ियात पर नाकारा है वो एतिक़ादी बातें हैं कि हर मुख़ालिफ़ अपने मुख़ालिफ़ के हक़ में कह सकता है।

10 तक़्लीअ

इस तअ्लीक़ का सारा बयान नाकारा है यहां से ख़ूब साबित हो गया कि इन छः (6) दलीलों के जवाब अहले इस्लाम के पास कुछ नहीं हैं नाज़रीन पहले ख़ुद उन जुम्ला दलीलों को तवारीख़-ए-मुहम्मदी में ग़ौर से देख लें उस के बाद मुंशी साहब का बयान इस तअ्लीक़ में सुनें।

(3,4,5) दलील का मुंशी साहब ने ये जवाब दिया कि ये दलीलें हमारे अख़्बार अहाद पर वाक़ेअ हैं ये क्या उम्दा जवाब है मुंशी साहब बहुत ही जल्दी इन दलीलों के जवाब की बाव्जाह से सबकबार हो गए।

क्या हक़ीक़त में ये अख़्बार अहाद पर वाक़ेअ हैं नाज़रीन आप ही इन्साफ़ कर सकते हैं शायद मुंशी साहब ने ग़ौर नहीं की या ग़ुस्से के सबब उन दलीलों का मतलब ज़हन में ना आया।

(1,2,6) दलील को मुंशी साहब ने अम्र एतिक़ादी बतला दिया और यूं उनकी बवजह के नीचे से निकले। मुंशी साहब को अम्र एतिक़ादी और अम्र अक़्ली में फ़र्क़ करना चाहीए था पस अब मैं कहता हूँ कि जनाब मुंशी साहब ये दलीलें उमूर अक़्लीया में से हैं ना सिर्फ एतिक़ादियात हैं हाँ मुंशी साहब ने वहां लफ़्ज़ क़ुरआन या कलाम-उल्लाह का लिखा पाया तो फ़ौरन ये ख़्याल किया कि ये अम्र एतिक़ादी हैं मगर दलील के हासिल पर नहीं सोचा कि वो अक़्ली हासिल है मुक़द्दमात दलाईल को उमूर एतिक़ादी जान लिया ना उमूर अक़्ली पस ये समझ का फेर है क्योंकि अगर कलाम या क़ुरआन का हवाला वहां से निकाल दिया जाये और वही बात उन्हीं दूसरी इबारत में कही जाये तब मुंशी साहब जानेंगे कि ये अक़्ली दलीलें हैं।

फिर कहा कि हर कोई अपने मुख़ालिफ़ को ये दलीलें सुना सकता है मैं कहता हूँ कि भला आप ही इन दलीलों को हमारी मुख़ालिफ़त में पेश तो करें देखो हम क्या जवाब देते हैं साहब ये तो आप ही की जान खाने वाले हैं। एक और बड़े मज़े की बात है जो मुंशी साहब ने इस तअ्लीक़ में बयान की है कि मुहम्मद

मुतावात्तिरहदीस, रिवायत या ख़बर उसको कहते है जिसके बयान करने वाले बहुत ज़्यादा हो और इन सब बयान करने वालों का झूट पर मुत्तफ़िक़ (एकमत) हो जाना आदतन नामुम्किन हो और यह की बयान करने वाले रावियों से इत्तिफ़ाक़न भी झूठ ना निकले इन खूबियों वाली हदीस या खबर को “मुतावात्तिर” कहते हैं।

अख़्बार अहाद- यानी वह हदीस या खबर जिसके रावी यानी नक़्ल करने वाले या बयान करने वाले बहुत ही कम तादाद में हो, यानी जिनकी तादाद एक दो ही हों या जिनकी तादाद दस (10) तक भी ना पहुंचती हो।

साहब के मोअजज़े तीन क़िस्म के हैं क़ुरआनी, तवातरी , अहादी और इस अपने बयान को वो अम्र अक़्ली जानते हैं ना अम्र एतिक़ादी क्योंकि वो कहते हैं कि इस को अक़्ला (अक़्लमंद) जहां क़ुबूल करेंगे और अक़्ला (अक़्लमंद) जहां उन के गुमान में वही मुसलमान हैं जो अरबी पढ़े हुए हैं और मुहम्मद साहब को ख़ूब मानते हैं बेशक ये अक़ला (अक़्लमंद) तो ज़रूर इस बयान को अक़्ली और माक़ूल जानेंगे कि मुहम्मदी मोअजज़ात तीन क़िस्म के हैं।

मेरी उम्मीद थी कि इन तीन क़िस्म के मोअजज़ात की मिसालें भी मुंशी साहब कुछ देंगे पर कुछ भी मिसालें नहीं दीं और अपने इस भारी दावे के नीचे से आप ही निकल गए तो भी मैं उन के इन तीन क़िस्म के मोअजज़ात की कुछ तशरीह कर देता हूँ।

शायद उन की मुराद मोअजज़ात अहादी से वो मोअजज़ात होंगे जो शवाहिद-उन्नबी वग़ैरा में सदहा मोअजज़े लिखे हुए हैं जिनके साथ रावियों का सिलसिला भी नहीं है। अच्छा साहब वो या उन की मानिंद और मोअजज़े अहादही हैं और मेरी (3,4,5) दलील बाकरार आपकी उन पर वाक़ेअ है भला साहब ये तो आप मान गए कि इन दलीलों से आपकी तीसरी क़िस्म के मुहम्मदी मोअजज़ात बर्बाद हो गए हैं और ज़रूर है कि आपके दिल में से भी उनका एतिक़ाद निकल गया होगा यहां मैं आपको शाबाश कहता हूँ।

मगर दूसरे क़िस्म के मोअजज़ात जिनको आप तवातरी कहते हैं और मेरी छः (6) दलीलों के इल्ज़ाम से बचे हुए बतलाते हैं लाज़िम था कि उन को मअरज़ बयान में लाते और उन का तवातर दिखलाते लेकिन मुंशी साहब ऐसे मोअजज़े कहाँ से लाएं एक भी ऐसा मोअजिज़ा नहीं है जो तवातर से साबित हो और इसी वास्ते मुंशी साहब मिसाल नहीं दे सके वो जान गए कि अगर कोई मोअजिज़ा हदीस का तवातर के दावे से पेश भी करूंगा तो ईसाई तवातिर का सबूत तलब करेंगे जो देना मुहाल (ना-मुम्किन) है और इस बारह सौ बरस में किसी मुहम्मदी की मजाल नहीं हुई कि तवातिर से कोई मोअजिज़ा साबित कर देवे इसलिए मुंशी साहब सिर्फ तक़रीरी में दावा करके चुप रह गए और चुप रहना मुनासिब भी था।

(फ) नाज़रीन को ख़ूब मालूम हो जाए कि मुसलमानों के इल्म उसूल-ए-हदीस के मुवाफ़िक़ मुतवातिर हदीसें चंद हैं मिस्ल आमाल बिल-नियात वग़ैरा के और वह जुदा करके बयान भी की गई हैं मगर उन में कोई भी हदीस मोअजज़ात के बारे में नहीं है ये मुल्लानी नाहक़ डराते हैं उनसे बे-ख़ौफ़ कहना चाहीए कि दिखलाओ या वह कौनसे मोअजज़े हैं जो तवातर से साबित हैं? इन लोगों ने तवातर के मअनी तो अपने उसूल में देखे हैं मगर कभी मोअजज़ात के हदीसों के सिलसिले में तवातिर पर फ़िक्र नहीं किया तवातिर का साबित करना आसान बात नहीं है अब देखो अहादी मोअजज़े मुंशी साहब के (3,4,5) दलील से बर्बाद हो गए और तवातरी का वजूद ही जहाँ में नहीं है अब दो क़िस्म के मोअजज़े तो उड़ गए। रहे क़ुरआनी मोअजज़े तो उन पर ग़ौर करना चाहीए।

मुतावात्तिरहदीस, रिवायत या ख़बर उसको कहते है जिसके बयान करने वाले बहुत ज़्यादा हो और इन सब बयान करने वालों का झूट पर मुत्तफ़िक़ (एकमत) हो जाना आदतन नामुम्किन हो और यह की बयान करने वाले रावियों से इत्तिफ़ाक़न भी झूठ ना निकले इन खूबियों वाली हदीस या खबर को “मुतावात्तिर” कहते हैं।

अख़्बार अहाद- यानी वह हदीस या खबर जिसके रावी यानी नक़्ल करने वाले या बयान करने वाले बहुत ही कम तादाद में हो, यानी जिनकी तादाद एक दो ही हों या जिनकी तादाद दस (10) तक भी ना पहुंचती हो।

मुंशी साहब ने अपने क़ुरआनी मोअजज़ों में से 13 मोअजज़े बयान किए मगर निहायत दबे दबे अल्फ़ाज़ में बारीक क़लम से हाशिये के दर्मियान लिखे हैं क्योंकि रक़ीक़ (बारीक़) बातों का जली (वाज़ेह) इबारत में लिखना ज़रा मुश्किल था मगर मैं तो उनके हाशिये को भी मतन ही जान के पढ़हूँगा।

(1)

(अल-सफ्फ़ात आयत 15)

وَقَالُوا إِنْ هَٰذَا إِلَّا سِحْرٌ مُّبِينٌ

कहते हैं कि ये तो साफ़ जादू है।

मुंशी साहब को ख़्याल गुज़रा कि हज़रत ने कोई मोअजिज़ा दिखलाया होगा जिसे लोगों ने सहर (जादू) कहा है पस मोअजिज़ा नामालूम पर ईमान लाए। शायद इस को भी उन्हों ने कोई भेद समझा जो इन्सान पर ज़ाहिर नहीं हो सकता है और मोअजिज़े का ख़्याल लफ़्ज़ सहर (जादू) से आया पर जिस इल्म उसूल-ए-हदीस पर नाज़ान हैं वहां लफ़्ज़ मुश्तर्क अलमाअनी को मतलब वाहिद पर दलील क़तई बनाना नाजायज़ है और ये अक़्ली क़ायदा है पर मोअजिज़ा नामालूम हाथ से ना जाने पाए इसलिए यहां कुछ परवाह उसूल के नहीं की सहर (जादू) के मअनी हैं जादूगीरी और उम्दा दिलचस्प बयान और शोब्दा बाज़ी, मक्कारी धोका वग़ैरा।

(2)

(सुरह यासीन आयत 46)

وَمَا تَأْتِيهِم مِّنْ آيَةٍ مِّنْ آيَاتِ رَبِّهِمْ إِلَّا ك

كَانُوا عَنْهَا مُعْرِضِينَ

और जो हुक्म उन्हें पहुंचता है अपने रब के हुक्मों में से वो उसे टला देते हैं।

पस आयात के मअनी यहां फ़िक्रात या अहकाम के हैं ना मोअजज़ात के।

(3)

(सुरह क़मर आयत 2)

سِحْرٌ مُّسْتَمِرٌّ

क़दीमी जादू

यानी वो जादू जो हमेशा से चला आता है यानी कोई ख़रक़-ए-आदत नहीं है उसी क़िस्म के काम में जो हम अरब के लोग हमेशा मक्कारों में देखते हैं यानी वो आम दग़ाबाज़ी की क़ुदरत जो हमेशा अरब में देखी गई यह आयत नस (इबारत) है इस बात पर कि जो काम उन्हों ने देखा था वो ख़रक़-ए-आदत ना थे बल्कि कोई शोबदे-बाज़ी थी जिसके देखने से ना हैरत हुई मगर साफ़ कहा गया कि मामूली बात है आम शोबदा-बाज़ी है ना ख़रके आदत (चमत्कार है) लफ़्ज़ मुस्तमिर مُّسْتَمِرٌّ ने यहां भी सहर (जादू) की कैफ़ीयत उड़ा दी। अगर कहा जाये कि इस पर लफ़्ज़ शक़-उल-क़मर شق القمر का मौजूद है सो जानना चाहीए कि अंशक نشقबमाअनी सनेश्क़ سنیشق है यानी क़ियामत को फटेगा क्योंकि अलिफ़ लाम الف لام अल-साअता الساعتہ (यानी क़यामत के दिन) का बतलाता है कि ऐन दिन क़ियामत का मुराद है और दो फे़अल माज़ी यानी इकतरब व अन्शकاقترب وانشق भी मिलकर इस्तिक़बाल का ज़िक्र करते हैं और वह रिवायत हदीस की कि फट गया था मुतवातिर नहीं है बल्कि क़ौल अहाद (यानी इक्का दुक्का की बयान करदा ख़बर) में है जो मुंशी साहब के नज़्दीक भी रद्द हैं और दलील इस की कि रिवायत मुतवातिर नहीं है ये इबारत मदारिक की है कि لوظہر عندہم لنقلو امتواتر اً لان الطباع جبلت علے نشراالعجائب لانہ یجوزان یحجب الیہ عنہم بغہیم यानी कोई ना कहें कि अगर चांद फट जाता तो अहले अक़्तार पर छिपा ना रहता और अगर उन्हें मालूम होता तो मुतवातिर नक़्ल भी करते (हालाँकि मुतवातिर रिवायत इस की नहीं है क्योंकि इन्सान की जिबिल्लत (पैदाईशी आदत) में ये बात दाख़िल है कि वो अजाइब बातों को मशहूर कर देता है पस जवाब ये है :-

मुम्किन है कि ख़ुदा ने बादल कर के उन से इस मोअजिज़े को छुपाया हो यानी कोने में चुपके से ये मोअजिज़ा किया होगा।

(4)

(सुरह सफ़ आयत 6)

فَلَمَّا جَاءَهُم بِالْبَيِّنَاتِ قَالُوا هَٰذَا سِحْرٌ مُّبِينٌ

बाअज़ क़ुरआनों में है साहिर मुबीन ساحر مبین तर्जुमा हज़रत ईसा कह गए थे कि मेरे बाद एक नबी आएगा उस का नाम अहमद होगा पर जब वो आया खुली निशानीयां लेकर तो कहने लगे कि ये जादू है ज़ाहिर। लफ़्ज़سحرसहर (जादू) के माअनी पहले मोअजिज़ा में मज़्कूर हो चुके हैं पर यहां एक लफ़्ज़بینات(बय्यिनात) का और है इस के मअने हैं “खुली हुई बातें” आम है कि फ़िक्रात क़ुरआन जो ज़ाहिर हैं वो बय्यिनात हैं या वह दलीलें हैं जिनमें से एक का ज़िक्र ऊपर हुआ है कि हज़रत ईसा ने बशारत दी थी, हालाँकि मह्ज़ ग़लत है हांलाकि बय्यिनात से मुराद मोअजज़ात तो हरगिज़ नहीं हैं क्योंकि कोई भी मोअजिज़ा ज़ाहिर नहीं है अगर मोअजज़ात हैं भी बक़ौल मुंशी साहब के तो ना-माअलूम और मुबहम गोल गोल मोअजज़े होंगे जिन पर लफ़्ज़ बय्यिनात सादिक़ नहीं आता हाँ उनका ये कहना कि ये “जादू है ज़ाहिर” या मुहम्मद जादूगर है ज़ाहिर उस के मअनी ये हैं कि इस की बातें साफ़ मक्कारी की हैं या वो साफ़ मक्कार है जिसमें मोअजिज़े का एहतिमाल भी नहीं हो सकता।

(5)

(सुरह बक़रह आयत 118)

قَدْ بَيَّنَّا الْآيَاتِ لِقَوْمٍ يُوقِنُونَ

हमने बयान की हैं क़ुरआन की आयतें वास्ते उस क़ौम के जो यक़ीन करती है।

या उनके अगले पैग़म्बरों के मोअजज़ात का ज़िक्र हमने सुनाया है इस क़ौम के लिए जो यक़ीन रखती है पस यहां से क्योंकर मालूम हुआ कि हज़रत साहिबे मोअजज़ात थे?

(6 )

(सुरह बक़रा आयत 99)

وَلَقَدْ أَنزَلْنَا إِلَيْكَ آيَاتٍ بَيِّنَاتٍ وَمَا يَكْفُرُ بِهَا

إِلَّا الْفَاسِقُونَ

और हम ने उतारे तेरी तरफ़ खुले फ़िक़्रे (فقرے) क़ुरआन के और ना मुन्कर होंगे उन से मगर फ़ासिक़ लोग।

यहां लफ़्ज़ आयात बमाअनी फ़िक्रात है ना मोअजज़ात।

(7)

(आल-ए-इमरान आयत 86)

كَيْفَ يَهْدِي اللَّهُ قَوْمًا كَفَرُوا بَعْدَ إِيمَانِهِمْ وَشَهِدُوا

أَنَّ الرَّسُولَ حَقٌّ وَجَاءَهُمُ الْبَيِّنَاتُ

क्योंकर अल्लाह हिदायत करेगा ऐसी क़ौम को जो ईमान लाकर काफ़िर हो गई और गवाही दे चुकी थी कि रसूल हक़ है और पहुंच चुकी थीं उन्हें निशानीयां।

बय्यिनात (بینات) के मअनी जलालेन में लिखे हैं (الحجج الظاہرات) यानी खुलीं हुज्जतें मगर मालूम नहीं है कि वो क्या क्या हुज्जतें थीं? बज़ाहिर वही हुज्जतें होंगी जो अब अहले इस्लाम सुनाते हैं मसलन फ़साहत कुरआन, ग़लबा शमशीर (तल्वार), मुल्कगीरी इस्तिक़ामत पर दावे या शायद कोई मोअजिज़ा भी हो जो नामालूम है फिर बय्यिनात के मअनी मदारिक में लिखे हैं (الشواہد کا لقران وسائر المعجزات) यानी लफ़्ज़ बय्यिनात (بینات) के मअनी हैं “क़ुरआन” और सब मुहम्मदी मोअजज़ात यानी कुल मोअजज़ात मुहम्मदियाह का मजमूआ वो लोग इन्कार से पहले ही देख चुके थे जिसकी तफ़्सील कोई नहीं जानता।

फिर तफ़्सीर हुसैनी में है (وجاء ہم البنیات) (وامدہ بود بدیشان ایت ہائے روشن) यानी क़ुरआन या मोअजज़ात पैग़म्बर। पस नाज़रीन को इन्साफ़ करना चाहीए। ख़ुदा को जान देनी है कि जब तक ठीक मालूम ना हो कि आया वोह मोअजज़ात थे या दूसरी हुज्जतें थीं? और अगर मोअजज़ात थे तो क्या-क्या थे, और क्योंकर वक़ूअ में आए थे? जब तक साफ़ बात मालूम ना हो तब तक क़तईयत का हुक्म देना मुंशी साहब ही का काम है हमारा काम नहीं है क्योंकि हम लोग अपना ईमान हर वहमी (ख़याली मनघड़त) बात पर नहीं रखते हैं।

(8)

(انعام آیت ۱2۴)

وَإِذَا جَاءَتْهُمْ آيَةٌ قَالُوا لَن نُّؤْمِنَ حَتَّىٰ نُؤْتَىٰ مِثْلَ

مَا أُوتِيَ رُسُلُ اللَّهِ

जब आती है उनके पास कोई आयत तो कहते हैं कि हम हरगिज़ ना मानेंगे जब तक हमें ना मिले जैसा पाते हैं अल्लाह के रसूल।

यानी जब क़ुरआन की आयत उन को सुनाई गई तो वो कहने लगे हम ना मानेगे जैसे क़ुरआन मुहम्मद पर उतरता है ऐसी हम पर क्यों नहीं उतरता पस हम इस आयत को यानी क़ुरआन के फ़िक़्रह को जो मुहम्मद लाया है कलाम-उल्लाह नहीं जान सकते यहां कुछ ज़िक्र मोअजिज़ा का नहीं।

हुसैनी में लिखा है چون بیاید بکفار قریش آیتے از قرآن یا معجزہ دراثباتنبوت यानी दुरुस्त मालूम नहीं है कि आयत से मुराद क्या है? मदारिक में है (آیتہ )ان معجزہ اوایتہ من القرآن यानी ठीक मालूम नहीं है पस क्या अब मुंशी साहब की ख़ातिर से आयत मिन-उल-क़ुरआन को छोड़कर मोअजिज़ा ही मानना चाहीए।

(9 )

(यूनुस आयत 2)

قَالَ الْكَافِرُونَ إِنَّ هَٰذَا لَسَاحِرٌ مُّبِينٌ

यानी जब मुहम्मद को हमने भेजा डराने और ख़ुशख़बरी सुनाने को तो काफ़िरों ने कहा ये तो सरीह जादूगर है।

यानी سحر सहर (जादू) बयान (बातों का जादू चलाने वाला) शख़्स है या साफ़ साफ़ मक्कार है यानी उस की मक्कारी ऐसी साफ़ है कि मोअजिज़ा का एहतिमाल नहीं हो सकता जलालेन में लिखा है (قال الکافرون ان ہذا لقران المشتمل علے ولک وسحر مبین بین وفی قراۃ لسا حرو مشار الیہ لنبی) तफ़्सीर बैज़ावी में लिखा है (ان ہذا یعنون الکتاب وماجاء بہ الرسول) यानी ये सहर (जादू) बयान (बातों का जादू चलाने वाला) शख़्स है या उसकी तक़रीरी जादू की तक़रीर है जैसे सब ख़ुश-बयान लोगों की निस्बत कहा करते हैं।

(10)

(साद आयत 4)

وَقَالَ الْكَافِرُونَ هَٰذَا سَاحِرٌ كَذَّابٌ

कहा काफ़िरों ने कि मुहम्मद जादूगर है बड़ा झूठा।

(11 )

(हदीद आयत 9)

هُوَ الَّذِي يُنَزِّلُ عَلَىٰ عَبْدِهِ آيَاتٍ بَيِّنَاتٍ لِّيُخْرِجَكُم مِّنَ

الظُّلُمَاتِ إِلَى النُّورِ

خख़ुदा वही है जो उतारता है अपने बंदे पर साफ़ फ़िक़्रे क़ुरआन के ताकि निकाले तुमको अंधेरे से, तरफ़ रोशनी के।

आयात बय्यिनात (بینات) के मअनी जलालेन ने क़ुरआन बतलाए हैं मोअजिज़े का यहां कुछ ज़िक्र नहीं है।

(12)

(बक़रा रुकूअ 25)

فَإِن زَلَلْتُم مِّن بَعْدِ مَا جَاءَتْكُمُ الْبَيِّنَاتُ فَاعْلَمُوا

أَنَّ اللَّهَ عَزِيزٌ حَكِيمٌ

अगर तुम गुमराह हो जाओ बाद इस के कि पहुंच चुके तुमको साफ़ हुक्म तो जान रखो कि अल्लाह है ज़बरदस्त हिक्मत वाला।

यहां कुछ ज़िक्र मोअजिज़ा का नहीं है।

(13)

( ज़ुख़रुफ़ आयत 30)

وَلَمَّا جَاءَهُمُ الْحَقُّ قَالُوا هَٰذَا سِحْرٌ وَإِنَّا بِهِ ك

كَافِرُونَ

यानी जब पहुंचा उन के पास सच्चा दीन तो कहने लगे कि ये जादू है हम इस को ना मानेंगे।

यानी मक्कारी की बातें हैं यहां भी मोअजिज़े का कुछ ज़िक्र नहीं है।

अब मुंशी साहब के 13 मोअजज़े क़ुरआनी भी तमाम हो गए ये वो आला दर्जे के मोअजज़े थे जो मुतवातिर मोअजज़ों से भी बुलंद थे।हम इनके बारे में ज़्यादा नहीं लिखते मगर इतना तो कहते हैं कि मुंशी साहब ने पहले ख़ुद क़ुरआन में और तफ्सीरों में इन की बाबत नहीं देख लिया। अगर किसी आदमी की तमीज़ उनको मोअजज़ात समझ कर क़ुबूल करती है तो वो अपना बेश-बहा ईमान मुहम्मद साहब के हवाले करे, पर हम तो इनको तुहमात (बेबुनियाद) कहते हैं।

हम ये नहीं कहते कि लफ़्ज़ سحر सहर (जादू) या آیات بینات आयात बय्यिनात से कभी मोअजिज़े पर इशारा नहीं हो सकता, हो तो सकता है पर जब कि ऊपर किसी मोअजिज़ा का साफ़ साफ़ बयान हो या कोई क़रीना क़वी (वाक़यात का आपस में मज्बूत ताल्लुक़) हो पर आयात मज़्कूर में ऐसा कहीं नहीं है।

मसलन यहां आयात का लफ़्ज़ ख़ास मोअजज़ात के मअनी में है कि (مامنعنا اِ ن ترسلہ بالآیات الاان کذب بھا الاولون) यानी हमने मुहम्मद को इसलिए मोअजज़े देकर नहीं भेजा कि पहले लोगों ने अगले पैग़बरों के मोअजज़ात की तक़्ज़ीब (झुठलाना) की थी।पस हमने कहा कि मोअजज़ात से क्या फ़ायदा है आगे दुनिया में इन से कुछ फ़ायदा नहीं हुआ अब भी ना होगा इसलिए मुहम्मद साहब को बग़ैर मोअजिज़े का रसूल बना कर हमने भेज दिया। यहां लफ़्ज़ آیات “आयात” मोअजज़ात के मअनी पर क़तई है, क्योंकि दूसरे मअनी इस के बयान हो नहीं सकते और अलिफ़ लाम (الف لام) यहां अल-आयात (الا یاؔت) का इस्तिग़राक़ (اِسْتِغْراق) के लिए है पस कोई भी मोअजिज़ा हज़रत में ना था।

साहब जबकि ये आयत सरीह मोअजिज़ा का मुतलक़ इन्कार करती है तो वो कौनसा आदमी है कि लफ़्ज़ सहरो बय्यिनात व आयात (سحرو بینات وآیات) के मअनी मोअजिज़ा क़रार दे के वहमी (ख़याली मन-घड़त) मोअजज़े जिनकी कैफ़ीयत भी मालूम नहीं है कि क्या-क्या थे मान बैठेगा?

और वह कौन है जो इन मुश्तर्क अल-माअनी लफ़्ज़ों से जबकि ख़ुद मुफ़स्सिर उन्हें मुश्तर्क लफ़्ज़ बतलाते हैं तो क़तईयत का फ़त्वा मोअजज़ों की निस्बत इन अल्फ़ाज़ से देगा और उसूल फ़क़ीह वही मानेगा जो तौज़ीह अल-तलवीह में लिखा है।

(फ) फ़ायदा नाज़रीन को मालूम हो जाए कि अब मुसलमानों ने फ़साहत व बलाग़त के मोअजज़े का ज़िक्र करना अक्सर छोड़ दिया है क्योंकि अब उन्हें भी कुछ-कुछ मालूम हुआ है कि वो मोअजिज़ा नहीं है और इसी सबब से देखो अब मुंशी साहब ने इस का ज़िक्र नहीं किया।

(फ) ये भी मालूम हो जाए कि मुंशी साहब ने जो मोअजज़ात मुहम्मदियाह की माक़ूल तक़्सीम की थी उस में से उन की अहादी मोअजज़े जो मशहूर है मुंशी साहब उन दलाईल से आप ही कटते हुए मान गए हैं जैसे ऊपर बयान हो चुका और तवातरी मोअजज़े जो बतलाए थे वो मादूम (ग़ायब) हैं उनका कहीं वजूद ही नहीं है और इसी लिए मुंशी साहब उन्हें पेश भी नहीं कर सकते थे पस वो यूं गए। बाक़ी क़ुरआनी मोअजज़े रहे थे सो वो बयान बाला से तुहमात (बेबुनियाद) साबित हुए अब मुहम्मद साहब बग़ैर मोअजज़े के नबी रह गए, इसी वास्ते मैंने तवारीख़ में इन छः (6) दलीलों से साबित कर दिया था कि मोअजज़ात का मज़्मून अहादीस में मह्ज़ ग़लत है।

11 तअ्लीक़

मसीह के हालात की कोई उन की हम-असर तहरीर मौजूद नहीं है मसीह ने अपने कलिमात व मवाइज़ व हालात ना तो आप लिखे ना अपने ज़माने क़ियाम में लिखवाए और ना हवारियों ने मसीह के अह्द में अपने मुशाहदात क़लम-बंद किए।

11 तक़्लीअ

मुंशी साहब ने बाअज़ बातें इस तअ्लीक़ में बेफ़ाइदा लिखी हैं जिनकी कुछ असल नहीं है या और तरह पर है।

मुंशी साहब को दीने ईसाई के सबूत के दलाईल से कुछ मस (तजुर्बा) भी नहीं है शायद उन्हों ने हमेशा मुख़ालिफ़ों की तहरीरें और तक़रीरें देखी और सुनी हैं और कभी ईसाईयों के नज़्दीक आ के सहीह बातें दर्याफ़्त नहीं कीं। मुंशी साहब ईसाईयों पर किल्लत मालूमात (कम इल्मी) का दाग़ लगाते हैं (2 तअ्लीक़) और अपनी मालूमात की ये खूबियां ज़ाहिर करते हैं।

मुंशी साहब ने इस तअ्लीक़ में बे सर्व-पादस्त अंदाज़ी की है और ऐसी चालाकी काम में लाए हैं कि नावाक़िफ़ आदमी कहेगा कि मुंशी साहब को बहुत बातें मालूम हैं। बात में बात एतराज़ पर एतराज़ करके ख़ूब इंशापर्दाज़ी की है और एक बेअसल बात पर दूसरी बेअसल बात बल्कि तीसरी व चौथी भी जमाई है और यूं एक जाल बनाया है ताकि इस में बाअज़ रूहों को फंसा के हलाक करें इस मुक़ाम पर उन की इंशापर्दाज़ी की तौहीन तारीफ़ करता हूँ हाँ उनके ता-बरता एतराज़ों के जवाब में वक़्त ख़र्च करना फ़ुज़ूल है पर इन बातों के जवाब दूँगा जो उनकी ज़बान दराज़ी के उसूल हैं।

पहली बात

मसीह के वक़्त की कोई तहरीर मौजूद नहीं है।

मुंशी साहब कैसी सुरखुरुई के साथ ये फ़िक़्रह लिखते हैं जबकि उस्मान का क़ुरआन और मुहद्दिसीन की मजुलदात हाथ में ले रहे हैं। मैं कहता हूँ क्यों साहब ऐसी तहरीर की क्या हाजत है जबकि हवारियों की तहरीरात मौजूद हैं जो मसीह के साथ मौजूद थे और उसी के रसूल हैं जो अम्बिया साबक़ीन से कहीं ज़्यादा मुअज़्ज़िज़ भी हैं और जो इल्हाम और क़ुदरत के साथ मुम्ताज़ भी नज़र आते हैं और दुनियावी शौकत और मज़दूरी के ख़्वाहां भी ना थे पर जानिसार थे। अगरचे शुरू में नाचीज़ थे मगर मसीह के शागिर्द और रसूल हो कर कोई नई क़िस्म के आदमी हो गए थे और ऐसे अच्छे और दाना हो गए कि वो ज़रूर अपनी ताअलीमात की बाबत और अपने चलन की बाबत निहायत ही मुम्ताज़ हो गए थे। ना सिर्फ हम ईसाईयों के सामने, पर सारे जहान के दानाओं के सामने भी अगर ग़ौर से उनकी तरफ़ देखें। उन की ताअलीम ने सारे जहां के मुअल्लिमों की ताअलीम को ज़रूर दबा लिया है बल्कि जहाँ को उल्टा दिया है और ये बात निहायत सच्च है मुंशी साहब फिर कहते हैं कि मसीह ने ख़ुद क्यों ना लिखा।

साहब ख़ुदा ने ख़ुद तौरेत क्यों ना लिखी मूसा से क्यों लिखवाई या क़ुरआन मुहम्मद साहब पर क्यों नाज़िल क्या आप ख़ुदा ने लिख के क्यों ना दिया?

मुंशी साहब यसूअ मसीह ख़ुदावन्द ख़ुदा है वो इन्सान बन के इन्सानों का वाजिब पूरा करने को और मेहरबानी से सलीब पर मर के और मुर्दों में से जी उठ के लोगों को ईलाही ज़िंदगी अता करने को आया था। (और लाखों आदमीयों ने उस से वो ज़िंदगी पाई भी है।)

दूसरी किताबों से उधारी लेना

मज़्मून लिखने का तरीक़ा

पस जिन लोगों के सामने उस ने ये काम किया यानी मुआ (मरा) और जी उठा और ख़ुदा के दहने जा बैठा सऊद फ़र्मा के उन्ही से इस वारदात का लिखवाना भी वाजिब था ताकि गवाहों की गवाही के साथ अपनी इंजील-ए-मुबारक की बशारत मुंशी साहब तक भी पहुंचाए।

फिर मुंशी साहब कहते हैं कि हवारियों ने मसीह के अह्द में क्यों ना लिखा? जवाब ये है कि साहब जब तक मसीह मर के जी ना उठे और सऊद ना फ़रमाए और पेशगोई की तक्मील ना कर चुके तो हवारी किस तरह से पहले ही लिख देते जो बात अब तक वाक़ेअ ही नहीं हुई है उसे पहले ही से किस तरह बयान करें? ज़रूर है कि पहले कोई अम्र वाक़ेअ हो तब तो गवाह उस के वक़ूअ या अदम वक़ूअ पर गवाही दें। मुंशी साहब चाहते हैं कि गवाह वारदात के देखने से और उस के वक़ूअ से पहले ही गवाही लिख रखा करें साहब ये दस्तूर ईसाईयों के उसूल का नहीं है।

दूसरी बात

ऐन ज़माना ख़ुदावन्द मसीह में तहरीर होने की वजह मुंशी साहब ने यूं इंशा (तहरीर) की है, कि हवारी मुग़ालते में फंस गए थे कि मसीह अभी आने वाला है अभी इस्राईल की बादशाहत को बहाल करेगा। अभी बारह शागिर्द बारह तख़्तों पर बैठेंगे पस तहरीर की क्या ज़रूरत है दुनिया तो जल्दी ही उलट पुलट होने वाली है।

देखो ये कैसी वाहीयात (बेहूदा) वजह मुंशी साहब ने बनाई है या मुल्हिद की बात में से निकाली है ताकि बुरा हमला करें लेकिन वो उम्दा और सच्ची और माक़ूल वजह जो ऊपर मज़्कूर है कि (मसीह अभी मर के जी नहीं उठे थे और वाक़ियात पूरे वक़ूअ में ना आ चुके थे) ज़हन शरीफ़ में ना गुज़रे क्योंकि तास्सुब ज़हन को रास्ती की तरफ़ जाने नहीं देता।

इन आयतों के मअनी जो मुंशी साहब ने अपने सफ़ा 25 पर लिखे हैं और उन के बातिल नताइज अपने मतन में बयान किए हैं चाहीए कि नाज़रीन बंदे के खज़ान-तुल-इसरार किताब में देख लें।

ये मुंशी साहब का मुबालग़ा बिल्कुल ग़लत है कि हवारियों को ऐसा एतिक़ाद था कि इसी ज़माने में क़ियामत आने वाली है देखो हवारी लोग अपना एतिक़ाद क़ियामत की बाबत अपनी तहरीर में अपने क़लम से और तरह लिखते हैं और मुंशी साहब उन्हें कुछ और ही इल्ज़ाम लगाते हैं।

(मत्ती 25:19) बहुत मुद्दत के बाद इन नौकरों का मालिक आया। (मत्ती 25:5) जब दुल्हे ने देर की सब ऊँघने लगीं और सो गईं। पस मसीह ने तो उन्हें सिखलाया कि मैं बहुत मुद्दत के बाद आउंगा और वह आप लिखते हैं कि हमें यूं सिखलाया :-

सऊद यानी आस्मान पर जाना

(मत्ती 24:6 और 48) पर अब तक आख़िर नहीं (आमाल 1:6 से 8) पस उन्हों ने जो इकट्ठे थे उस से ये कह के पूछा कि अब ख़ुदावन्द क्या तू इसी वक़्त इस्राईल की बादशाहत फिर बहाल करता है उस ने उन्हें कहा कि तुम्हारा काम नहीं इन वक़्तों और मौसमों को जिन्हें बाप ने अपने ही इख़्तियार में रखा है जानो लेकिन जब रूह-उल-क़ूद्दुस तुम पर आएगा तो तुम क़ुव्वत पाओगे और यरूशलम और सारे यहूदियाह और सामरिया में बल्कि ज़मीन की हद तक मेरे गवाह होगे। आमाल 3:21 में देखो कि रसूल लोग उस की आमद सानी की बाबत अपना क्या एतिक़ाद बतलाते हैं यानी ये कि ज़रूर है कि :-

“आस्मान उसे लिए रहे उस वक़्त तक कि सब बातें जिनका ख़ुदा ने अपने सब मुक़द्दस नबियों की ज़बानी क़दीम से ज़िक्र किया बहाल होवें।”

2 पतरस 3:8 से 10 में है कि :-

“पर ये बात तुम पर ऐ प्यारो छिपी ना रहे कि ख़ुदावन्द के नज़्दीक एक दिन हज़ार बरस और हज़ार बरस एक दिन के बराबर है।”

पस मसीह ख़ुदावन्द साफ़ साफ़ और बार-बार फ़रमाता है कि मैं बहुत देर में आउंगा और रसूल बयान करते हैं कि वो देर में आएगा और पहले सब नबियों की बातें पूरी होंगी और यह कि दुनिया की हद तक उस की इंजील पर गवाही दी जाएगी। फिर मुंशी साहब उन्हें ये इल्ज़ाम क्यों लगाते हैं कि वो लोग उन्हीं दिनों में उस की आमद के मुंतज़िर थे इसलिए किताब के लिखने में सुस्त हो गए थे?

देखो बावजूद ऐसी ख़बरों के जिनका ज़िक्र ऊपर हुआ कौन कह सकता है कि उन्हें ऐसा ख़्याल था कि अभी क़ियामत आने वाली है।......... अलबत्ता क़ियामत के लिए बहुत ही तैयार थे जैसे हम भी इस वक़्त बहुत ही तैयार हैं और हर वक़्त उस की आमद पर नज़र लगी है क्योंकि सिर्फ वो हमारा हक़ीक़ी दोस्त है हम उसे हर वक़्त रूह में ताकते हैं पस ये इंतिज़ारी, और तैयारी और बात है और इसी वक़्त क़ियामत आने का यक़ीन बांधना, और बात है जो बातिल है।

देखो जबकि मसीह ख़ुदावन्द ने यहां तक क़ियामत की बाबत फ़रमाया कि क़ियामत के दिन का इल्म किसी फ़रिश्ते या किसी इन्सान को नहीं दिया गया बल्कि मेरी इन्सानियत भी इस इल्म से मुअर्रा है सिर्फ मेरी उलूहियत में वो इल्म है तो अब हवारियों की इन्सानियत में कहाँ से आ गया था कि हवारी यह बातें आप ही कलमबंद कर के भूल गए थे हरगिज़ नहीं ये ख़्याल हवारियों का कभी ना था ये मुंशी साहब की इंशा (लिखावट) है।

तीसरी बात

मुंशी साहब कहते हैं कि जब ज़माना मुम्तिद गुज़र गया और ज़बानी रिवायतों में ज़ईफ़ आ गया उस वक़्त लोगों ने तहरीरी तज़किरों पर तवज्जा की।

इस इंशापर्दाज़ी (यानी मज़्मून लिखने का तरीक़े) पर ग़ौर करना चाहीए कि ऐसी इबारत बोलते हैं जिससे कुछ मालूम नहीं होता कि आया अहादीस की निस्बत कहते हैं या कलाम ईलाही की निस्बत बोलते हैं ऐसी गोल-गोल बात लिखते हैँ जिससे जाहिलों को कलाम की निस्बत शक पड़ जाये।

पस मालूम करना चाहीए कि अगर वो अहादीस मसीह की निस्बत ऐसा बोलते हैं तो सच्च है कि उन की निस्बत ईसाईयों की तवज्जा निहायत कम है और मुनासिब भी था कि उन की निस्बत तवज्जा कम करते क्योंकि हदीसें बुरी बला है और मसीह ख़ुदावन्द ने उन्हीं हदीसों की बाबत यहूदीयों को इल्ज़ाम भी दिया है कि तुम अपनी रिवायतों के सबब ख़ुदा के कलाम को टाल देते हो पस ईसाईयों को नहीं चाहिए कि हदीसों के बहुत दरपे हों देखो हदीसों ने यहूद को और रोमन कैथोलिक को और मुसलमानों को किस दर्जे पर पहुंचा रखा है कैसी ग़लती में हैं।

हाँ अगर मुंशी साहब कलाम ए ईलाही की निस्बत ऐसा ख़्याल करते हैं तो बिल्कुल नावाक़िफ़ हैं क्योंकि हवारियों ने हदीसें जमा करके या रिवायतों के ज़ईफ़ और सिलसिले तलाश करके अनाजील और ख़ुतूत नहीं लिखी हैं ये इस क़िस्म की बातें नहीं हैं हवारी ख़ुद पैग़म्बर ख़ुदा थे और ख़ुदा के इकलौते बेटे के साथ थे जब वो दुनिया में जिस्म के साथ हाज़िर था और उस के सऊद (आसमान पर उठाए जाने) के बाद हवारियों में ख़ुदा की रूह आ गई थी जो ख़ुद ख़ुदा है पस उन्हों ने ना मुहद्दिसों की मानिंद अहादीस की किताबें लिखीं ना उस्मान की मानिंद क़ुरआन को मुरम्मत किया बल्कि अपने दीद (देखने) और शनीद रूह से अनाजील और ख़ुतूत लिखे उन का कलाम रब का कलाम है क्योंकि रब आप उन में बसता था उन की क़ुव्वत से ज़ाहिर है।

इसी वास्ते इब्तिदा से उन की तहरीरात को जो अनाजील और ख़ुतूत मुंदरजा इंजील हैं कलीसिया ने कलाम-उल्लाह माना है और हक़ीक़त में वही कलाम-उल्लाह है।

मुंशी साहब मुहम्मदी क़ुरआन तो क़ुबूल करते हैं जिसे उस्मान ने लिखा जो ख़ुद पैग़म्बर (नबी) ना था और जिस ने मुहम्मद साहब के ज़माने का लिखा हुआ क़ुरआन और अबू बक्र का जमा किया हुआ दूसरा क़ुरआन और बाअज़ मुतफ़र्रिक़ (फर्क रखने वाले) औराक जला दिए और जब क़ारीयों की कस्रत दफ़ाअ होने लगी उस वक़्त क़ारीयों की ज़बान से अपनी राय के मुवाफ़िक़ एक क़ुरआन इंतिखाब करके अरब को दिया जिस पर आज तक शीयों का तकरार भी है और ख़ुद मुंशी साहब के हमसाया या हम शहर यानी लखनऊ के मुज्तहिद साहब क़ुरआन की नज़्म को नज़्म उस्मानी बतला कर उस के सियाक़ को क़ुबूल भी नहीं करते हैं पस ये क़ुरआन को मुंशी साहब बिला हुज्जत मानते हैं क्योंकि इस्लाम में पैदा हुए हैं और इस क़ुरआन के मानने के ख़ूगर (आदी) हैं।

मगर मसीह के रसूलों की इंजीलों पर शक करते हैं जिन्होंने अपने क़लम से या अपनी ज़बान से इसी अह्द में कि हज़ार-हज़ार आदमी मसीह के देखने वाले जीते थे लेकिन और उसी अह्द में उन्हें रिवाज भी दिया। इन पाक और बरहक़ किताबों पर मुंशी साहब अपनी हदीसों का वबाल डालकर इन की ख़ूबी को दाग़ लगाना चाहते हैं इस सबब से की क़ुरआन की चमक इनकी रोशनी के सामने तारीक हो गई है यही अहले इस्लाम का इन्साफ़ है।

चौथी बात

अभी ये लोग तो इस आमद मौहूम के ख़्याली पुलाव पका ही रहे थे कि इस पर तुर्रा हुआ कि युहन्ना हवारी ने बड़ी ही उम्र पाई और इस के ज़्यादा मुअम्मर होने से इस एतिक़ाद के ईजाद हुए कि मसीह के क़ौल की तस्दीक़ के लिए ख़ुदा ने युहन्ना की उम्र बेहद बढ़ा दी है।

देखो मुंशी साहब कैसे बेबाक शख़्स हैं जिन्हें ना ख़ुदा का ख़ौफ़ है ना आदमीयों का या उन्हों ने इंजील नहीं पड़ी मैं पूछता हूँ कि क्या इन फ़िक़्रों की तर्तीब दुरुस्त है उनसे क्या मालूम होता है नेक नीयती या ठट्ठा बाज़ी किया। (युहन्ना 21:22-23) का यही मतलब है जो मुंशी साहब ने निकाला है नाज़रीन इंजील युहन्ना में देखें। मैं पूछता हूँ कि अभी तो मसीह ख़ुदावन्द ने सऊद भी नहीं किया था सिर्फ मुर्दों में से जी उठे हैं और अभी दुनिया ही में है चन्द रोज़ बाद जाने वाले हैं। पहले ही आमद मौहूम का ख़्याली पुलाव भी पक गया और युहन्ना का मुअम्मर होना भी पहले ही हो गया और मुअम्मर हो जाने के सबब इस ख़्याल का ईजाद भी हो गया और अभी रिवायत में ज़ईफ़ भी आ गया। ये वाहीयात बातें हैं ये ख़्याली पुलाव ईसाईयों ने कभी अपने ज़हन में नहीं पकाया मगर ये तो मुंशी साहब के इंशा (तहरीर की) की खिचड़ी है।

पांचवीं बात

इस अरसे तक बहुत सी झूटी तहरीरें इंजीलों और हवारियों के ख़ुतूत के नाम से जमा हो कर एक अंबार हो गई थीं।

इस का जवाब यही है कि हज़ार अंबार हो जाएं कुछ पर्वा नहीं है क्योंकि कुछ नुक़्सान नहीं है देखो जब मूसा और अम्बिया दुनिया से चले गए तो उन की हदीसों और क़िस्सों के यहूदीयों में कैसे अंबार हो गए थे और जब मुहम्मद साहब चले गए तो सुन्नी शीयों और ख़ारिजियों वग़ैरा की हदीसों के कैसे अंबार हो गए हैं क्या यहूदीयों के अंबारों के सबब अह्दे अतीक़ की ईलाही किताबें लायेक़-ए-एतबार ना रहीं? या मुहम्मदी अंबारों के सबब क़ुरआन लायक़े एतबार ना रहा? साहब लाख अंबार हो जाएं जो किताबें रसूलों से कलीसिया ने दस्त-ब-दस्त ख़ुद पाई थीं उन्हीं की हिफ़ाज़त क़दीम से नस्लन बाद नस्लन जमाअतें करती आईं और वह अंबार कभी कलाम-ए-ईलाही ना समझे गए वो हमेशा जुदा रहे। और अब तक जो बर्बादी से महफ़ूज़ हैं जुदा हैं। आप केमुहम्मद वज़ीर ख़ान और मौलवी रहमत-उल्लाह साहबने भी बाद तहक़ीक़ लाचार हो के इक़रार किया है कि क़दीमी कुतुब मुस्ल्लिमा ईसाईयों की वही हैं जो इन्जील की जिल्द में हैं।

छठी बात

हर-चंद कि ये क़दहे इज्माली अनाजील अरबा के सहीह-उल-सनद ना होने के सबूत में काफ़ी होगा मगर हम उन पर फ़रादी फ़रादी नज़र करेंगे।

जवाब क्या ख़ूब क़दहे इज्माली है जिसका सर है ना पैर क़दहे इज्माली भी किया ख़ूब मुक़द्दमात मंश्याना से मुरक्कब है जिसका फ़िक़्रह फ़िक़्रह बह्स तलब है और जिसमें बहुत से सरीह-उल-बतलान मुक़द्दमे शामिल हैं।

मगर इस क़दहे इज्माली का नतीजा मुंशी साहब ये निकालते हैं कि अनाजील अरबा के सहीह-उल-सनद ना होने के सबूत में काफ़ी होगा। ये क्या उम्दा तहक़ीक़ है ऐसी बातों को मुंशी साहब काफ़ी दलाईल जानते हैं पर वो भी माज़ूर (बेबस) हैं क्योंकि इस्लाम का सबूत इसी क़िस्म के दलाईल से हुआ है तब ही तो मुख़ालिफ़ की तर्दीद में वो इस क़िस्म की बातों को काफ़ी जानते हैं क्योंकि ऐसी बातों से वो तसल्ली के ख़ूगर (आदी) हैं।

मगर जबकि वो इस अपनी क़दह-ए-इज्माली को इंजील की तर्दीद की दलील जानते हैं और भी उनका क़दह-ए-इज्माली क़ुरआन पर अच्छी तरह गिरता हुआ उन्हें दिखलाया गया है तो क्या अब वो क़ुरआन के सहीह-उल-सनद ना होने के लिए भी इस अपने क़दह इज्माली को काफ़ी जानेंगे या नहीं? साहब ये क़दह आपका ना अनाजील के हक़ में मुज़िर है ना क़ुरआन के क्योंकि बातिल तक़रीरों का ढकोसला है जो आपने ग़ुस्सा में लिख मारा है।

सातवीं बात

लूका की इंजील की निस्बत फ़रमाते हैं कि इस ने अपने मुशाहिदा से नहीं लिखी वो हवारी ना था तबक़ा सानी का आदमी था।

जवाब- हम कब कहते हैं कि लूका हवारी था इस तहसील हासिल से क्या फ़ायदा है हम लूका को उस इंजील का मुअल्लिफ़ और मुरत्तिब और मुहर्रिर जानते हैं वो पौलुस रसूल की ख़िदमत में रहता था और इस ने कई एक हवारियों को भी देखा है और उस ने कोशिश के साथ इन बातों को दर्याफ़्त भी करके लिखा है आप कहता है कि कलाम के खादिमों से यानी हवारियों से और वाक़ियात के देखने वालों से मैंने कोशिश के साथ दर्याफ़्त करके लिखा है पस ये इंजील अगरचे ख़ुद किसी हवारी ने नहीं लिखी मगर उन्हीं की ज़िंदगी में उन्हीं से पूछ कर उन्हीं के हम ख़िदमत ने इसी अह्द में जब लिखी है तो फिर ये क्या बात है कि वो ख़ुद हवारी ना था इसलिए उस की तहरीर को ना मानें और उसे तबक़ा सानी का आदमी बतलाना क्या मअनी रखता है? वो तो रसूलों से बातें करता है उन के अह्द में मौजूद है पस वो उसी तबक़ा हवारियों के अह्द का शख़्स है। फिर मुंशी साहब फ़रमाते हैं कि बाद मुहासिरा यरूशलम लूका की इंजील लिखी गई है ये ग़लत बात है क्योंकि आमाल की किताब से पहले लूका ने ये इंजील लिखी है बमूजब (आमाल 1:1) के और आमाल की किताब लूका ने रोम में जा के तमाम की है 63 ई० में और यरूशलम का मुहासिरा हुआ है 70 ई० में फिर ये इंजील बाद मुहासिरा यरूशलम क्योंकर लिखी गई थी? इस के बाद मुंशी साहब ने लूका की इंजील पर कुछ गोल गोल एतराज़ भी किए हैं यानी आयात के मज़ामीन पर वो मुहमल (बेमतलब) इबारत में लिखे हैं इसलिए तवज्जोह के लायक़ नहीं हैं।

आठवीं बात

युहन्ना की इंजील युहन्ना की नहीं है। क्योंकि पापियास (Papias of Hierapolis) ने और पोलीकार्ब (Polycarp) ने इस इंजील का ज़िक्र नहीं किया हाँ अरीनियुस (Irenaeus) ने किया है जो पोलीकार्ब का शागिर्द था पस शागिर्दों ने ज़िक्र किया और उस्ताद ने नहीं किया तो सिलसिला मुत्तसिल (मिला हुआ) ना रहा इसलिए युहन्ना की इंजील ना रही।

जवाब अरीनियुस (Irenaeus) और थियाफिलुस अन्तकतिया वाले (Theophilus of Antioch) ने और तर्तिलियान (Tertullian) ने और क्लिमंट सिकंदरियह वाले ने (Clement of Alexandria) और हियूलेस ने और ओरिजेन Origen ने और डीवनिसियस ने जो सिकंदरिया वाला है (Pope Dionysius of Alexandria) और यूसीबस (Eusebius of Caesarea) ने युहन्ना की इंजील पर गवाही दी है।

और मुख़ालिफ़ीन में से भी जूलियन ने और पूरफर (Porphyry) बुतपरस्त फ़ैलसूफ़ (philosopher) ने भी गवाही दी है।

और युहन्ना की इंजील का सुर्यानी तर्जुमा जो दूसरी सदी का है बक़ौल अल-फ़ौर्ड तफ़्सीर के वो भी अब तक गवाह है।

पस कलीसिया में इस का दस्त-ब-दस्त आना और इतने मोअतबर अश्ख़ास की गवाहियाँ जिनका ज़िक्र ऊपर है अगर उस के हक़ में काफ़ी दलील नहीं है तो और इस से ज़्यादा हम कुछ कह नहीं सकते।

हाँ पापियास (Papias of Hierapolis) ने और पोलीकॉर्प (Polycarp) ने इस का ज़िक्र नहीं किया बल्कि बरनबास व क्लिमंट रूमी ने (Clement of Rome) और अगनाशियस ने (Ignatius of Antioch) भी इस इंजील का ज़िक्र नहीं किया। तो भी सिलसिला मुत्तसिल (मिला हुआ) बाक़ी है मुंशी साहब सिलसिला मुत्तसिल (मिला हुआ) की तारीफ़ अपने घर में तज्वीज़ (बना) करके दुनिया को इस के मुवाफ़िक़ टटोलते हैं और जब अपनी तारीफ़ के मुवाफ़िक़ नहीं पाते तो सिलसिला मुत्तसिल (मिला हुआ) के अदम का फ़त्वा देते हैं साहब सारा जहां आपके उसूल-ए-हदीस का ग़ुलाम नहीं है।

पस मालूम करना चाहिए कि पापियास (Papias of Hierapolis) और पोलीकार्प (Polycarp) का ना लिखना। और इरेनेसियस (Irenaeus) का लिखना सिलसिला मुत्तसिल (मिला हुआ) में मुख़िल (रोक डालने वाला) नहीं है क्योंकि पापियास (Papias of Hierapolis) की किताब ही दुनिया में मौजूद नहीं है जिससे लिखना या ना लिखना साबित हो। हाँ यूसीबस (Eusebius of Caesarea) ने पापियास (Papias of Hierapolis) की बातों का कुछ इंतिखाब किया है पस पापियास के अक़्वाल मिलते हैं ना उस के मजलदात।

और पोलीकार्प की कौनसी किताब मौजूद है जिससे लिखना या ना लिखना साबित हो? उस का सिर्फ एक छोटा सा ख़त है जो फिलिप्पियों को इस ने लिखा था पस जबकि उन लोगों की तहरीरात ही मौजूद नहीं हैं तो क्योंकर कह सकते हैं कि उन्हों ने लिखा है या नहीं लिखा? पोलीकार्प ने तो लूका की इंजील का ज़िक्र नहीं किया सिर्फ मत्ती और मरक़ुस की इंजील का ज़िक्र किया है इसलिए कि ख़त में हर बात के ज़िक्र का मौक़ा नहीं हुआ करता है।

फिर देखो बिलफ़र्ज़ पापियास ने युहन्ना की इंजील का ज़िक्र नहीं किया तो भी उस ने युहन्ना के पहले ख़त का ज़िक्र किया है और ज़रूर युहन्ना का पहला ख़त ख़ुलासा है युहन्ना की सारी इंजील का उसे ज़रा ग़ौर से पढ़ कर देखना।

हासिल कलाम हालाँकि कलीसिया ने तहक़ीक़ात करके माना है कि ये इंजील और सब अनाजील बल्कि सारी बाइबल उन्हीं मुसन्निफ़ों की है जिनके नाम पर उस के हिस्से मंसूब हैं तब हमें क्या परवाह है कि पोलीकार्प ने ज़िक्र किया है या नहीं जब अर्नियुस की गवाही मौजूद है जो उन के साथ मिलने वाला मोअतबर बुज़ुर्ग उस्क़ुफ़ है कलीसिया की गवाही हज़ार गवाहियों से बेहतर है। अफ़्सोस की बात है कि अब तक अहले हिंद में से पुराने ख़यालात दफ़ाअ नहीं हुए।

नौवीं बात

मत्ती व मरक़ुस की इंजील का ज़माना गो क़यासन क़रार पाया है तो भी उनका इंतिसाब (ताल्लुक़) तरफ़ उन मुसन्निफ़ों के दो सौ बरस तक सिलसिला अस्नाद से साबित नहीं है।

जवाब- हर बात जो क़ियास से साबित हो मुंशी साहब के नज़्दीक शायद लायक़ एतबार नहीं है पर जिस इल्मे दीनी को मुंशी साहब माने बैठें हैं उस की बुनियाद अदला अर्बाअ (चार इमाम के चार मस्लक) पर रखी हुई है और वहां चौथी क़िस्म की दलील क़ियास शुमार हुआ है सद हा मसली क़यासी इस्लाम में हैं जो इबादात और अक़ाइद के रुत्बे में भी पहुंच जाते हैं वहां वो क़ियास को मकरूह चीज़ नहीं जानते। मगर इंजील के ज़माने तहरीर में भी क़ियास से कुछ बोलना उन्हें अच्छा मालूम नहीं होता है क्योंकि इंजील के लिए ज़रा ज़रा सी बातें भी किताब-उल्लाह से साबित होनी चाहिऐं पर क़ुरआन और इस्लाम के लिए दलाईल अर्बा (चार इमामों के क़ियासी दलाईल) हैं ये मुंशी साहब का इन्साफ़ है।

फिर यह जो वो फ़रमाते हैं कि उनका सिलसिला मुत्तसिल (मिला हुआ) नहीं है मैं कहता हूँ कि अगर आपके मुहद्दिसों की इस्तिलाह के मुवाफ़िक़ नहीं है तो ना हो मगर अक़्ल और इन्साफ़ के मुवाफ़िक़ तो है नाम बनाम है आदमीयों को शुमार करने का नाम अक़्ल के नज़्दीक सिलसिला मुत्तसिल (मिला हुआ) नहीं है लेकिन क़रीना (वाक्यात का आपस ताल्लुक़) और वक़्त माबीनी भी हमारी अक़्ल के उसूल में सिलसिला मुत्तसिल (मिला हुआ) के मुनाफ़ी (खिलाफ) नहीं है पस जबकि सिलसिला मुत्तसिल की इस्तिलाह ही में हमारे तुम्हारे दर्मियान फ़र्क़ है तो अपनी इस्तिलाह से ग़ैर पर हमला करना और उस से दरख़्वास्त करना कि मेरी इस्तिलाह के मुवाफ़िक़ बोल और मेरी तज्वीज़ (बनावट) के मुवाफ़िक़ चल नहीं तो तू नादान है ये कौनसी दानाई है?

हासिल कलाम हालाँकि सिलसिला मुत्तसिल (मिला हुआ) तो ज़रूर एक उम्दा चीज़ है मगर इस के मअनी जो आप लोगों ने तस्नीफ़ किए हैं उस में सक़्म (खराबी) है और उस सुक़्म के सबब आप हमारी किताबों पर सक़्म (खराबी) लगाते हैं ये ग़लती आप लोगों की है।

और ये बात मुंशी साहब की बिल्कुल इफ़्तिरा (बोहतान) है कि दो सौ बरस बाद इंतिसाब (ताल्लुक़) हुआ है ये किताबें शुरू से अपने मुसन्निफ़ों (लिखने वालों) की तरफ़ कलीसिया में मंसूब हैं।

दसवीं बात

मशाइख़ मुतक़द्दिमीन (पहले ज़माने के उलेमा) के कलाम से जो चंद फ़िक़्रे इन अनाजील के निकाल कर ईसाई कहते हैं कि मशाइख़ मज़्कूर ने इन अनाजील से सनद ली है इसलिए ये किताबें बरहक़ हैं ये बात तीन दलीलों से बातिल है। :-

(1) मशाइख़ यूं नहीं लिखते कि ये बात मत्ती या मरक़ुस या लूका या युहन्ना यूं फ़रमाता है, या उन की किताब में यूं लिखा है, मालूम नहीं कि वो कहाँ से कहते हैं?

(2) वो अक़्वाल ज़बानी आए थे ना उन कुतब से।

(3) बाअज़ तहरीरात इन मशाइख़ की भी मौज़ूआत में शामिल हैं तो ये भी मौज़ू (झूठे) होंगे।

जवाब

मुंशी साहब की तीनों दलीलें नाकारा हैं और उनका हासिल मुंशी साहब का मंशा हरगिज़ पूरा नहीं करता :-

(1) ये कहना कि मशाइख़ मुतक़द्दिमीन (पहले ज़माने के उलेमा) अनाजील के नाम या उन के लिखने वालों के नाम बतला के हवाला नहीं देते हैं अगरचे बातें वही बोलते हैं जो इन अनाजील में पाई जाती हैं इस सूरत में मुंशी साहब कहते हैं कि मालूम नहीं कि वो कहाँ से कहते हैं। हम कहते हैं कि हमें मालूम है कि वो कहाँ से कहते हैं वो उन किताबों में से कहते हैं जो उन की पैदाइश से पहले लिखी गई हैं और जो उस जमाअत में मुरव्वज (जारी) हैं जिनमें वो मशाइख़ भी शामिल हैं और वह किताबें उन बुज़ुर्गों की तरफ़ मंसूब भी हैं जो उन मशाइख़ के भी बुज़ुर्ग हैं और यह मशाइख़ उन बुज़ुर्गों के नक़्श-ए-क़दम पर चलना अपनी सआदतदारें जानते हैं पस अब क्यों कर कह सकते हैं कि मालूम नहीं कि वो कहाँ से कहते हैं?

(2) ये कहना कि वो अक़्वाल ज़बानी आए थे इस का जवाब ये है कि पहले तो मुंशी साहब को मालूम ना था कि कहाँ से कहते पर अब दूसरी दलील में मालूम हो गया क़तअन कि वो ज़बानी रिवायत से कहते थे उस का हासिल ये है कि मुंशी साहब कह गए कि हमारी पहली दलील भी ग़लत है जहाँ कहा था कि मालूम नहीं है अब मालूम हुआ कि ज़बानी अक़्वाल से कहते हैं।

बिलफ़र्ज़ अगर ज़बानी अक़्वाल से भी कहते हैं तो कैसी ख़ूबी की बात है की तहरीरी अक़्वाल ज़माना-ए-क़दीम की ज़बानी अक़्वाल की बईना मुताबिक़ हैं तब ये ज़्यादा-तर मज़बूत दलील हक़ीक़त इन कुतुब की होगी।

(4) ये कहना कि बाअज़ तहरीरात इन मशाइख़ की भी मौज़ूआत में शामिल हैं तो ये भी मौज़ू (झूठे) होंगे।

क्या अच्छी दलील है जो मुंशी साहब ने निकाली है इस के बारे हमें इतना कहना बस है कि अगर अबू हुरैरह सहाबी की तरफ़ कोई शरीर (बुरा) आदमी अपने दिल से एक हदीस बना कर मंसूब करे कि इस ने यूं कहा है और उलमा मुहम्मदियाह यूं कहें कि ये हदीस हरगिज़ उस की नहीं है फ़ुलां-फ़ुलां वजह से तो मुंशी साहब की तीसरी दलील से यूं कहा जाएगा कि जो हदीस अबू हुरैरा की हमें कहीं नज़र आए शायद वो भी मौज़ू है क्योंकि पहले एक हदीस उस की मौज़ू (झूठी) साबित हो चुकी ये बेजा क़ियास है।

12 तअ्लीक़

इमाद-उद्दीन ने नहीं बतलाया कि ऐसा झूट बनाने से मुहम्मद साहब की क्या ग़रज़ थी?

12 तक़्लीअ

तवारीख़-ए-मुहम्मदी सफ़ा 309 में राय मुअल्लिफ़ लिखी है और उस राय में सब कुछ इख़्तिसार के साथ मुंदरजा है हाँ मुझसे इस क़द्र ज़रूर कोताही हुई कि मैंने ख़ूब खुलके नहीं कहा कि इस दावे से हज़रत की क्या ग़रज़ थी? लेकिन ये कोताही मैंने इसलिए की थी कि तवारीख़ के वाक़ियात से ख़ुद ज़ाहिर है कि बादशाह बनने का हज़रत को शौक़ था और कोई सूरत बादशाह होने की ना थी तब नबुव्वत का दावा करके उम्मत पैदा की और उम्मत को फ़ौज बनाया और ख़ुदा के नाम से जिहाद करना अम्र ज़रूरी बतला के बादशाहत हासिल की और बहुत मज़े भी उड़ाए इस ग़रज़ से ये दावा किया था और यह ग़रज़ भी हासिल हो गई थी।

13 तअ्लीक़

मुहम्मद साहब के तक़ल्लुब अहवाल से साबित है कि वो दावा-ए-नबुव्वत में सच्चे थे। उन्हों ने चालीस (40) बरस की उम्र में दावा-ए-नुबूव्वत किया और अपने आबाओ अज्दाद (बाप दादा) के मज़्हब को बल्कि सब दुनिया के मज़्हबों को बातिल बतलाया और बरसों तक मुसीबतें उठा के अपने दावे पर मौत तक साबित-क़दम रहे और उन का माल दौलत और इज़्ज़त भी ख़ाक में मिल गई। अगर बातिल दावा था तो उन्हें ऐसी तक्लीफ़ और नुक़्सान उठाने से क्या हाजत थी? वो बराबर नमाज़ रोज़े पर क़ायम रहे और दुनियावी सल्तनत में भी दुनियावी आमेज़िश से अलग रहे। अगर कहो कि वहम हो गया था तो वहम और धोके का असर कुछ और होता है और इदराक व एहसास का असर कुछ और होता है।

13 तक़्लीअ

इस मुक़ाम पर भी मुंशी साहब ने अपनी तहरीर में बड़ा ज़ोर लगाया है और ख़ूब इंशा (तहरीर) की है लेकिन उन की सारी तक़रीर का ख़ुलासा यही है जो ऊपर लिखा गया। पर ये सब बयानात उन के मुग़ालितों से भरे हुए हैं पर मैं इन की असली बातों का जवाब दूंगा ना हर फ़िक़्रह का।

पहली बात

मुंशी साहब कहते हैं कि उन्हों ने चालीस बरस की उम्र में दावा-ए-नुबूव्वत किया।

ये बात सच्च है लेकिन इस सन् व साल में दावा करने से क्या ख़ूबी निकलती है? हाँ इस उम्र में आदमी ज़रा तजुर्बेकार तो हो जाता है मगर जाहिल आदमी के तजुर्बात भी ज़रा अच्छे नहीं हुआ करते।

मुहम्मद साहब ने ज़रूर इस उम्र में कुछ आक़िबत (आखिरत) का फ़िक्र और कुछ दुनिया का फ़िक्र और कुछ हुसूल शौकत का फ़िक्र ज़हन में जमा किया था और उस का ये नतीजा दिखलाया जो तवारीख़े मुहम्मदी में मर्क़ूम है तौरेत में ख़ुदा का हुक्म था कि (30) बरस की उम्र में काहिन ख़ुदा के ख़ेमे की ख़िदमत का काम शुरू करे। सो मसीह ने ऐन वक़्त पर 30 बरस की उम्र में काम शुरू किया अगर सन व साल की कुछ फ़ज़ीलत है तो मसीह को है ना मुहम्मद साहब को क्योंकि मसीह ने शरीअत के मुवाफ़िक़ काम किया मुहम्मद साहब ने शरीअत से तजावुज़ फ़रमाया।

दूसरी बात

मुहम्मद साहब मौत तक अपने दावे पर साबित-क़दम रहे इस का क्या बाइस था? यानी बीस बरस अपने दावे पर साबित क़दमी दिखला के इंतिक़ाल फ़रमाया तब वो अपने दावे में ज़रूर सच्चे नबी थे।

जवाब

जनाब मुंशी साहब मुतलक़ साबित क़दमी कोई उम्दा वस्फ़ नहीं है कि जिस शख़्स में जिस क़िस्म की साबित क़दमी पाई जाये तो वो ज़रूर सच्चा ही होता है हज़ारों शरीर (बुरे) और जाहिल और फ़रेब-ख़ूर्दा (धोकेबाज़) अश्ख़ास (लोग) अपनी बुरी हालत में भी साबित-क़दम रह कर और बड़े बड़े दुख भी उठा कर दुनिया में मर गए हैं तो क्या उन की साबित क़दमी ये बात साबित करेगी कि वो अपने ख़यालात व अक़ाइद में सच्चे थे हरगिज़ नहीं मगर हालाँकि अपनी नादानी को ख़ूब पकड़ा था।

ये साबित क़दमी अगर मुहम्मद साहब की नबुव्वत पर दलील काफ़ी है तो उन बेचारे लोगों ने किया क़सूर किया है।

साबित क़दमी उसी शख़्स की महमूद (तारीफ़ के लायक़) है जिसकी ताअलीम और चलन और पाकदामनी ने जहां को मज्बूर कर दिया है और वह मसीह ख़ुदावन्द यसूअ है सो पहली मुहम्मद साहब की निस्बत इन उमूर ज़रूरी को दिखलाना चाहीए उस के बाद साबित क़दमी भी महमूद (तारीफ़ के लायक़) और मक़्बूल हो सकती है अब तो हमें उन की तरफ़ से अफ़्सोस है कि कैसी बुरी हालत में साबित-क़दम रह कर इंतिक़ाल फ़रमाया जिस बात पर हमें अफ़्सोस है उसी बात को मुंशी साहब दलील सबूत बना लाए हैं।

साहब मदीना में जाकर दस बरस तक साबित क़दमी दिखला के मरना तो उन्हें निहायत ही ज़रूर था क्योंकि जिस दावे के वसीले से ये शौकत (शान) हाथ आई थी उस दावे में और भी गर्मजोशी आएगी या उस से किनारा-कशी होगी जो सारी कमाई की बर्बादी का बाइस है। हाँ दावा-ए-नुबूव्वत से हिज्रत के वक़्त तक ज़लज़ला आना मुम्किन था पर कोई सख़्त सबब ज़लज़ले का भी ना था एक दो या ज़्यादा कम आदमी कभी-कभी ज़रूर मुरीद होते रहते थे उन्हें उम्मीद नज़र आती थी कि अगरचे अभी कुछ तक्लीफ़ है मगर मैं आहिस्ता-आहिस्ता क़ुव्वत पा सकता हूँ क्योंकि बुत-परस्ती अक़्लन कुछ चीज़ नहीं है जो कोई अरब ज़रा भी फ़िक्र करेगा वो ज़रूर मेरे मुजर्रिद वहदत (तौहीद) की निस्बत बुत-परस्ती को बुरा जानेगा और मैं पीर मुर्शिद हो जाउंगा और अगर मैं मर भी गया तो क्या मज़ाइक़ा है आख़िर सबको मरना है मेरा नाम तो अरब में मशहूर रहेगा और ज़रूर ऐसी कोशिश कि बुत-परस्ती दफ़ाअ हो और मुजर्रिद वहदत जारी हो हर किसी की मोटी अक़्ल में भी महमूद (तारीफ़ के लायक़) है पस ये बातें ज़हन में थीं और हर तरफ़ मदद के लिए भी ताक रहे थे और साई भी अज़हद थे यहां तक कि अहले मदीना का क़ाफ़िला आ गया जो अहले मक्का के साथ अदावत रखते थे पस मुहम्मद साहब ने उन के साथ निस्फ़ शब में साज़िश की और वो साज़िश भी निहायत ही मुफ़ीद पड़ी। ख़ुद मदीना के अंसार ने जंग हुनैन की लूट के तक़्सीम के वक़्त इन सब बातों का ज़िक्र किया है कि हमने तुझे क्या से किया बना दिया और मुहम्मद साहब ने क़ुबूल भी किया देखो तवारीख़-ए-मुहम्मदी में और रोज़तुल-अहबाब वग़ैरा में भी कि क्या लिखा है।

तीसरी बात

मुंशी साहब का ये कहना कि मुहम्मद साहब इस दावे के सबब एक अमीर आदमी से ग़रीब बन गए और उन का बहुत सा दुनियावी नुक़्सान हो गया। ये बात दुरुस्त नहीं है वो हरगिज़ ऐसे अमीर और दौलतमंद ना थे जैसे मुंशी साहब बतलाते हैं उन की रियासत ऐसी थी जैसे दिहात में चौधरी होते हैं या उस से भी कम हाँ अब्दुल मुत्तलिब के ज़माने में कुछ दुनियावी ताक़त थी मगर उस के दस बेटे हुए थे और विरासत तक़्सीम हुई और खाने को रोटी भी ना रही थी हज़रत मुहताज थे देखो सीरत-उन्नबी किताब का (सफ़ा 62) लिखा है :-

باب سفرہ صلعم اے الشام ثانیا مع میسرۃ غلام خدیجتہ وذلک لما بلغ صلعم خمساً و عشرین سنتہً وسبب ذلک ان عمہ ا با طالب قال یا ابن اخی انارجل لامال لی وقد اشتد علینا الزمان والحت علینا سنون منکر ۃ ولیس لنا مادہ ولاتجارۃ الخ۔

इस का ख़ुलासा ये है कि हज़रत के चचा ने कहा ऐ भतीजे हम निहायत तंगहाल हैं दीर से हमारे ऊपर तंगी आ गई है फ़ुक़्र फ़ाक़ा (तंगदस्ती और भुखमरी) हम पर ग़लबा कर गया है बेहतर है कि तू ख़दीजा से कुछ क़र्ज़ लेकर शाम की तरफ़ तिजारत को जाये।

इस के सिवा बाप का तरका (विरासत) जो हज़रत ने पाया था वो ये था एक लौंडी, पाँच ऊंट और एक गल्ला बकरीयों का और शायद एक घर भी जो मुहम्मद इब्ने यूसुफ़ बज़्ज़ाज़ का घर मशहूर था जहां हज़रत पैदा हुए थे देखो ये बड़े रईस की रियासत थी।

और बज़ाहिर मईशत ये थी कि काअबा का चढ़ावा लेते होंगे और उन अय्याम में चढ़ावा भी बहुत ना था क्योंकि उस वक़्त काअबे की ज़यारत को सिर्फ अरब ही आते थे ना इस वक़्त के मुवाफ़िक़ कि हर तरफ़ से मुसलमान जाते हैं और चढ़ावा भी अपने हिस्से के मुवाफ़िक़ पाते होंगे। अगर मुंशी साहब कहें कि ख़दीजा का माल लेकर हज़रत बड़े सौदागर हो गए थे तो याद रखना चाहीए कि इस ज़माने की सौदागरी के मानिंद उस वक़्त अरब की सौदागरी ना थी फ़ारिगुलबाली से खाना कपड़ा हासिल करना वहां उस वक़्त बड़े सौदागर के लिए बस था और मुहम्मद साहब कुछ सौदागर ना थे मगर एक क़िस्म के बयोपारी थे।

ये हज़रत की दौलत साबिक़ा और रियासत का हाल है मगर बाद दावा नबुव्वत के चंद बरस की तक्लीफ़ मुनासिब के पीछे हम उन्हें इतना बड़ा बादशाह अरब का देखते हैं कि उन के आबा-ए-अज्दाद (बाप दादों) में कभी कोई ऐसा नहीं हुआ पस अब हम पूछते हैं कि इस दावा-ए-नुबूव्वत के सबब से नुक़्सान उठाया या फ़ायदा नाज़रीन की तमीज़ इन्साफ़ करे मुंशी साहब ऐसे मुग़ालते देते हैं।

चौथी बात

फिर मुंशी साहब कहते हैं कि हज़रत ने ये तक्लीफ़ क्यों उठाई नक़द फ़ायदा तो उस वक़्त कुछ नज़र ना आता था।

जवाब

अव्वल तो इस में कलाम है कि कौन सी बेहद तक्लीफ़ उठाई हाँ शुरू में कुछ तक्लीफ़ उठाई कि शहर के लोग दुश्मन हो गए थे जैसे इस वक़्त में ईसाईयों के दुश्मन हो जाते हैं पर हज़रत का कोई ना कोई चचा या रिश्तेदार ज़रूर हिमायती बना रहा था और अगर इतनी भी तक्लीफ़ ना उठाते जो हर मजद व मज़्हब को उठाना लाज़िम है तो ये लुत्फ़ जिसकी उम्मीद थी क्योंकर हासिल हो सकता? दुनिया में बग़ैर तक्लीफ़ के कुछ भी हाथ नहीं आता है।

फिर देखो कि बाइस (वजह) तक्लीफ़ उठाने का किया था? ये कि बुत-परस्ती से मना करते थे और बुत परस्ती से मना करना नबुव्वत ही पर मुन्हसिर नहीं है बल्कि हर दाना की तमीज़ भी कहतीं है कि इस की बेख़कुनी में जो तक्लीफ़ उठाई जाये ऐन नेकी है देखो गुरूनानक ने कैसी कोशिश करके पंजाब के हिंदूँ में से बुत-परस्ती को निकाला।

और जब इस के साथ एक उम्मीद भी दिल में क़ायम हो जाएगी तो कितनी जुर्आत और हिम्मत दुख उठाने में आ जाएगी।

मुहम्मद साहब के ज़हन में ये बात ख़ूब जम गई थी कि बुत-परस्ती निहायत मकरूह चीज़ है और यह कि इब्राहिम जिसके हम भी नस्ल कहलाते हैं हरगिज़ बुतपरस्त ना था बल्कि वो ख़ुदा तआला का पैग़बर था।

अब क्या करूँ अहले-किताब की तरफ़ देखता हूँ तो वो ख़ुद आपस में एक दूसरे के दुश्मन हैं यहूदी मुंतज़िर हैं किसी मसीह मौहूम के ईसाई मसीह को ख़ुदा का बेटा बतलाते हैं जो समझ में नहीं आता अब मैं क्या करूँ तहक़ीक़ात कुतुब का मैं इल्म नहीं रखता और दुनिया की तरफ़ से भी रोज़गार की तंगी है।

बेहतर है कि ख़ुदा की वहदत मुजर्रिद को ख़ूब पकड़ूं और इबादत भी अपनी मर्ज़ी के मुवाफ़िक़ करूँ और जो कुछ ख़ुदा ज़हन में डाले मैं उसी को इल्हाम समझूँगा। जब इस मर्तबा पर-ख़याल आ गया तो उस रूह ने जो सब के दरपे है अपनी तासीर के लिए अच्छा मौक़ा पाया और ऐसी हालत देख के इस ने हज़रत को दावा-ए-नुबूव्वत पर बरान्गख़ीता किया और ज़हन ने इस दावे को ख़ूब पकड़ भी लिया और जब ये दावा मुंह से निकला तो फिर उस के पीछे भी ज़ोर शोर से आघुसी और कुछ-कुछ शागिर्द भी होने लगे तब उम्मीद क़वी हुई और अपने दावा नबुव्वत की तस्दीक़ भी अपने ज़हन में आई और दुनियावी शिरकत का ख़्याल और तंगदस्ती की तक्लीफ़ भी इस के मुआविन और मददगार हो गई इस तौर से इस दावे की तस्मिम ज़हन में आघुसी।

और इस दावे की बाबत जो कदरे तक्लीफ़ात आने लगीं उन की बर्दाश्त की ताक़त भी अब मज़बूती से पैदा हो गई और इसलिए एक ग़ैरत मंदी भी ख़ुदा के लिए दिल में जोश-ज़न हुई मगर कोई ना समझे कि हर कोई जो ख़ुदा के लिए ग़ैरत मंद नज़र आता है वो हक़ीक़त में राह-ए-रास्त पर है क्योंकि ख़ुदा के लिए तीन क़िस्म की ग़ैरत मंदी जहां में नज़र आती है।

(1) नादानी की ग़ैरत मंदी।ये वो ग़ैरत मंदी है जिसमें दिल ख़ालिस है पर ज़हन में तारीकी है एक वक़्त पौलुस रसूल भी इस हालत में था।

(2) नादानी बालतमाअ (लालच) की ग़ैरत मंदी। ये वो है जिसमें दिल के अंदर तमअ (लालच) और ज़हन में नादानी है ये उन में पाई जाती है जो ख़ुदा और दुनियां दोनों के तालिब हैं।

(3) ख़ालिस दानाई (अक़्लमन्दी) की ग़ैरत मंदी। ये वो है जिसमें दिल पाक और ज़हन साफ़ है ये ग़ैरत मंदी सब सच्चे दीनदारों में है और दूसरे वक़्त पौलुस में भी आ गई थी।

पस मुहम्मद साहब में अगरचे ख़ुदा के लिए एक ग़ैरत मंदी हम देखते हैं मगर दिल में पाकीज़गी और ज़हन में रोशनी हम नहीं देखते इसलिए हम उन की ग़ैरत मंदी पर फ़रेफ़्ता नहीं हो सकते जैसे कि मुंशी साहब इस पर फ़रेफ़्ता हैं और हमारे सामने इस हज़रत की ग़ैरतमंदी को एक दलील नबुव्वत भी बना कर पेश करते हैं।

पांचवें बात

मुहम्मद साहब दुनियावी सल्तनत में भी दुनियावी आमेज़िश से अलग रहे।

जवाब

दुनिया की आमेज़िश से मुंशी साहब का क्या मतलब है? आया शराब कबाब नाच राग रंग करोफर एश व इशरत फ़ल्सफ़ाना? या कुछ और मतलब है हम जानते हैं कि ज़रूर यही मतलब होगा और बेशक मुहम्मद साहब इन बातों से अलग रहे और क्यों ना अलग रहें अगर इन बातों में धस जाएं तो फिर पीरी कहाँ और लोगों के एतिक़ाद जो बमुश्किल कुछ बंद ही हैं क्योंकर क़ायम रहेंगे? फिर तो एक दम में सल्तनत ही उड़ जाएगी सल्तनत की तरफ़ से क्या कुछ इत्मीनान है जो ऐसी हालत में क़दम रखें मुंशी साहब ऐसा मुग़ालता ना दीजिए।

इस मुक़ाम पर मुहम्मद साहब की चालाकी को ख़्याल फ़रमाना चाहीए कि जब उरूज हुआ तो ऐसी चाल इख़्तियार की साँप भी मर जाये और लाठी भी ना टूटे।

नाच राग रंग शराब कबाब कुछ इस्तिमाल में ना लाए मगर दीनदारी के पैराए में आयतें उतार उतार कर नफ़्सानी ख़्वाहिशों को ख़ूब ही पूरा किया और उम्मत के लिए भी इसी पैराए में एक कुशादा दरवाज़ा खोल दिया और जहां तक क़ाबू चला एक भी दुश्मन ना छोड़ा जिहाद के हीले (बहाने) से ख़ूब तल्वार चलाई और लूटा और लोगों की औरतें पकड़ कर इस्तिमाल में लाए ताज्जुब की बात है कि कुतब सैर तो ये कुछ दिखलाती हैं पर मुंशी साहब ये फ़रमाते हैं कि वो नबी बरहक़ थे ऐसे मंतिक़ को भी सलाम है और ऐसी नबुव्वत को भी सलाम है फिर वो जो बाअज़ अंग्रेज़ों के अक़्वाल मुंशी साहब निकाल के दिखलाते हैं और उन के साथ अपनी अगर मगर मिलाते हैं। हम इन बातों में बह्स नहीं करते हैं क्योंकि हम जानते हैं कि इन के अक़्वाल कुछ सहीह और कुछ ग़लत हैं मुहम्मद साहब एशिया के बाशिंदे थे उन की निस्बत एशिया के लोग बातें करेंगे ना अहले यूरोप चुनान्चे मसीह की निस्बत भी एशिया के लोगों के अक़्वाल ज़्यादा-तर मोअतबर हैं।

14 तअ्लीक़

जिस ज़माने में मुहम्मद साहब थे वो ज़माना बड़ी जहालत का था और हज़रत ने ना इल्म पढ़हा और ना किसी से कुछ सुना और ना हज़रत किसी बाहर के मुल्क में कुछ सीखने को गए तो भी हज़रत ने ईलाही मार्फ़त के भेद ऐसे बयान किए कि तमाम अक़्ला (अक़्लमंद) जहां हैरान हैं।

14 तक़्लीअ

इस बात का जवाब हम मुंशी साहब को क्या दें हैरान हैं क्योंकि ये निहायत तहक़ीक़ व तदकीक की बातें हैं जो मुंशी साहब ने ज़ाहिर की हैं।

हाँ मैं इतना कहता हूँ कि मेरी तमीज़ क़ुबूल नहीं करती कि इस दर्जे की तारीकी उस वक़्त अरब में थी क्योंकि उस अह्द के मुसन्निफ़ों और शाइरों के ख़यालात हमें ख़ूब मालूम हैं हाँ किसी क़द्र तारीकी थी मगर ना इतनी जितनी मुंशी साहब बतलाते हैं क्योंकि मुंशी साहब ने कुतुब इस्लामीया में इस्लाम से पहले ज़माने का नाम अय्याम-ए-जाहलीयत सुना है जो अरब की निस्बत मुहम्मदियों ने एक इस्तिलाह ठहराई थी मगर वो लोग अपनी शरीअत की अदमे मौजूदगी के ज़माने को ज़माना जहालत कहते थे ना कि अरब मह्ज़ बेवक़ूफ़ थे मुआमलात दुनियावी में भी। और मैं ये भी क़ुबूल नहीं कर सकता कि मुहम्मद साहब इस्तिफ़ादा से इस क़दर महरूम हों जिस क़दर मुंशी साहब उन्हें महरूम ठहराते हैं।

क्योंकि जब दुनिया का ये दस्तूर है कि अदने आला (छोटे बड़े) जिस क़द्र क़ुदरत का आदमी है उस क़द्र कुछ ना कुछ इस्तिफ़ादा (फायदा) अपने अहबाब (मिलने जुलने वालों) की सोहबत (संगती) से और अअ्दा व अजानिब (मुखालिफ और ग़ैर) के मुआमला से और वाक़ियात रोज़मर्रा के दीद (देखने) से और दीनदारों और बद दीनों की बह्स के सुनने से और दूसरे ममालिक के बाशिंदों और उन के अक़ाइद व दस्तुरात (रस्मों) के सुनने से और देखने से और बुज़ुर्गों की कहानीयों से और दुनिया की मुसीबतों से और ख़ुशीयों से कुछ ना कुछ फ़ायदा हर आदमी ज़रूर ही हासिल करता है। यानी कुछ ना कुछ उसके सर में भर जाता है बुरा या भला वो आदमी ख़्वाह ख़वांदा (पढ़ा लिखा) या नाख़वांदा (अनपढ़) हो। हर एक अपने ज़र्फ़ और अपनी इस्तिदाद (सलाहियत) के मुवाफ़िक़ आप को ख़ुद बख़ुद पैदाईश ही से भरना शुरू करता है।

और इज़्ज़तदार आदमीयों के बच्चे ज़रूर अवाम के बच्चों से ज़्यादा-तर होशियार और ज़की व शाईस्ता होते हैं। पस ना-मुम्किन है कि मुहम्मद साहब ऐसे सख़्त महरूम हों जैसे कि मुंशी साहब ने उन्हें महरूम बना के उनकी इज़्ज़त ख़राब की है क्योंकि वो अक़्लन ऐसे सख़्त महरूम नहीं हो सकते हैं। मगर ये बात मुंशी साहब की शायद हंसी की है कि मुहम्मद साहब ने इस क़दर मार्फ़त ईलाही के दक़ाइक़ (अच्छी बुरी बात के वह पहलु जो गौर करने से समझ कर आएं) दिखलाये हैं कि तमाम जहान के अक़ला (अक़्लमंद) हैरान हैं।

इसका जवाब ये है कि वो अक़ला (अक़्ल रखने वाले) जो ताअलीम ए मुहम्मदी से हैरान हैं उनकी अक़्ल और हमारी अक़्ल में बहुत फ़र्क़ है। पस चूँकि हमारे अंदर वो अक़्ल नहीं है इसलिए हम इस बात को क़ुबूल करने से माज़ूर हैं। और हम उन अक़्ला (अक़्ल रखने वाले) की तक़्लीद करना भी नहीं चाहते क्योंकि उनकी राह में हमें मौत नज़र आती है। मुंशी साहब का दिल चाहता है कि जो बात बाईबिल की निस्बत हर तरफ़ से बोली जाती है वही बात क़ुरआन की निस्बत भी मैं बोलूँ शाबाश शाबाश हिमायत इसी का नाम है। साहब कोई जाहिल आदमी अगर क़ुदरते ईलाही से ऐसा हो जाये जैसे हवारी हो गए थे, तो ज़रूर क़ियास चाहता है कि उस ने ख़ुदा से सीखा मगर मुहम्मद साहब ऐसे नहीं हैं क्योंकि उन की ताअलीम इस दर्जे की नहीं।

15 तअ्लीक़

ज़रूर मुहम्मद साहब उम्मी اُمی (अनपढ़) थे और उन्हों ने हरगिज़ किसी से ताअलीम नहीं पाई। और मुख़ालिफ़ीन भी हज़रत को दुनियावी का मूनमिन् दाना और माहिर तस्लीम करते हैं मगर हमारे ज़माने के ईसाई साफ़ बातों का भी इन्कार करते हैं तो भी ये क़ुबूल करते हैं कि हज़रत उम्मी (अनपढ़) थे और इब्रानी यूनानी नहीं जानते थे और तौरेत इंजील नहीं पढ़ी थी मगर यूं कहते हैं कि अहले-किताब से ख़्वाह बाअज़ सफ़रों में ख़्वाह ग़ुलामों वग़ैरा से अपनी वतन ही में कलाम-ए-मुक़द्दस सुना था। पस ये ईसाईयों की ग़लती है क्योंकि हज़रत ने कभी अहले-किताब से कुछ नहीं सुना जे़ल के दस उमूर से साबित है।

15 तक़्लीअ

मुंशी साहब नाहक़ एक नाकारा बात में इस क़द्र दर्द सिरी कर रहे हैं उनका मुख़्तसर जवाब ये है कि बेशक मुहम्मद साहब उम्मी (اُمی) थे लेकिन उम्मी के क्या मअनी हैं? उम्म (اُم) वालिदा (माँ) को कहते हैं या निस्बती के साथ उम्मी यानी माँ का यानी जैसे माँ के पेट से निकला वैसा आदमी मुराद है जिसने दुनिया में कुछ नहीं सीखा। अगर इन मअनी से मुहम्मद साहब उम्मी (اُمی) कहलाते हैं तो मह्ज़ बातिल बात है अक़्लन क्योंकि चालीस बरस तक ऐसे ही मज़ग़ा गोश्त रहना क़ियास में नहीं आ सकता।

दूसरे मअनी उम्मी (اُمی) के अनपढ़ आदमी के हैं सो मुहम्मद साहब बेशक अनपढ़ आदमी थे मगर चालीस बरस तक जिस क़द्र सब अनपढ़ आदमी भी होशियार हो सकते हैं इस क़द्र तो होशयारी और वाकफ़ी हज़रत ने ज़रूर ही हासिल की थी क्योंकि लाखों उम्मी (अनपढ़) इस वक़्त भी दुनिया में मौजूद हैं वो मह्ज़ मज़ग़ा गोश्त नहीं हैं कुछ ना कुछ उन्हों ने भी सीखा है बल्कि हज़ारों उम्मी (अनपढ़) ऐसे हैं कि पढ़हों (पढ़े लिखों) की निस्बत ज़्यादा चालाक और होशियार हैं क्योंकि उन में इस्तिदाद (सलाहियत) है अगरचे तर्बीयत नसीब नहीं हुई तो भी उन्हों ने ज़माने से तर्बीयत पाई है इसलिए कि (الدہر فصح المادبین ) मशहूर कहावत है पस मुहम्मद साहब भी ऐसे ही थे और उन की ताअलीम और चलन और ख़यालात भी इसी दर्जे के हैं यानी जैसे वह उम्मी (अनपढ़) थे तो उम्मियों के लायक़ क़ुरआन के मज़ामीन भी हैं क़ुरआन कौनसी उम्दा और अजीब ताअलीम है जो उम्मी (अनपढ़) की तस्नीफ़ होने से ताज्जुब किया जाये? वो तो उम्मी (अनपढ़) के दर्जे के मुवाफ़िक़ अपने अंदर बयान रखता है इसके बयानात में कहीं हक़ीक़ी तनाक़ुज़ (इख्तिलाफ़) है, नावाक़िफ़ी भी है, और बाअज़ सच्चे बयान भी ग़लती के साथ मन्क़ूल हैं और बाअज़ वही बातें हैं जो उस ज़माने में अहले अरब और गर्द नवाह (आसपास) के ख़ास व आम के ज़हनों में और दस्तुरात (रस्मों) में थीं और कोई गहिरी पुर-मग़्ज़ रूहानी ताअलीम भी इस में नहीं है ना कोई नई ख़ूबी ताज्जुब-अंगेज़ इस में है और इन्सान के वाजिबी ज़रूरी दिली सवालों का जवाब भी इस में नहीं है और इस सबब से वो और भी तसल्ली बख़्श चीज़ नहीं है फिर इस मुआमले में इस क़द्र ज़ोर देने से क्या फ़ायदा है मुंशी साहब नाहक़ इस में कोशिश करते हैं पर उन के वो दस उमूर भी देख लेना चाहीए।

अम्र अव्वल

अगर हज़रत अहले-किताब की कुतुब से कुछ अख़ज़ करते तो ज़रूर ये बात ज़ाहिर हो जाती और इस का चर्चा उस वक़्त अरब में हो जाता मगर इस का ज़िक्र कुछ भी नहीं है।

जवाब

हमें और सब अहले इन्साफ़ को पूरा यक़ीन है कि हज़रत ने ज़रूर कुतुब अहले-किताब से कुछ अख़ज़ (इकठ्ठा) किया है और ऐसा अख़ज़ (इकठ्ठा) किया है जैसे सब जाहिल अनपढ़ भी समईआत (सुन लेने) से किया करते हैं और इस का चर्चा भी उस वक़्त अरब में हो गया था और ऐसा सख़्त चर्चा हुआ था कि मुहम्मद साहब को लाचार हो के क़ुरआन में इस का जवाब देना पड़ा था और वह जवाब भी नाक़िस (अधुरा) था।

सूरत नहल की 103 आयत में लिखा है :-

وَلَقَدْنَعْلَمُ أَنَّهُمْ يَقُولُونَ إِنَّمَا يُعَلِّمُهُ بَشَرٌ لِّسَانُ الَّذِي يُلْحِدُونَ إِلَيْهِ أَعْجَمِيٌّ وَهَٰذَا لِسَانٌ عَرَبِيٌّ مُّبِينٌ

तर्जुमा: ख़ुदा कहता है हमको मालूम है कि लोग यूं कहते हैं कि मुहम्मद को सिखलाता है एक आदमी जिस आदमी को वो सिखलाने वाला ख़्याल करते हैं उस आदमी की ज़बान तो अज्मी (ग़ैर-अरबी) है और यह क़ुरआन तो साफ़ फ़सीह अरबी ज़बान है।

पस उस अज्मी (ग़ैर-अरबी) ने ये फ़सीह (साफ़) अरबी क्योंकर सिखलाई? तफ़्सीर जलालेन में लिखा है (وہوقین نصرانی کان النبی یدخل علیہ ) यानी वो आदमी एक ईसाई लोहार था, पैग़म्बर साहब उस के पास जाया करते थे।

तफ़्सीर मदारिक में लिखा है :-

ارادبہ غلا ماً کان لخولطیب قداسلم وحسن اسلامہ واسمہ عایش اویعش دکان صاحب کتب اوہو جبر غلام رومی اوعبدان جبر ویسا ر کانا یقرآن التور اۃ والا نجیل وکان رسول اللہ یسمع مایقران اورسلمان الفارسی۔

तर्जुमा: बशर से मुराद है एक ग़ुलाम जो ख़ूलतीब का ग़ुलाम था वो मुसलमान हो गया था और अच्छा मुसलमान बना था उस का नाम आयश या यईश और उस के पास बहुत किताबें थीं। या एक और रूमी ग़ुलाम था जिसका नाम जबर था या दो ग़ुलाम थे जबर व यसारीह दोनों तौरेत और इंजील पढ़ा करते थे, और नबी साहब सुना करते थे उनका पढ़ना। या सलमान फ़ारसी मुराद होगा। तफ़्सीर हुसैनी में लिखा है :-

درخبراست کہ غلامی رومی بود مرعامربن خفرمی رامیگو یند کہ جبر گفتند ے وگویند کہ دو غلام بودند جبر یسا رکہ شمشیر ہارا صیقل مے زوندے واہل کتاب بود ندہ پیوستہ توریت وانجیل خواندندے چون رسالت پنا ہ بر الیشان بگذشتے استماع قرات الیشان فرمود ی و گفتہ اند خولطیب راغلامی عایش نام بوداز اہل کتاب یا یعیش یا بعلام یا نحیس یا عداس واصح السنت کہ اورابو فکیہ گفتندے شبہا پیش حضرت پیغمبر آمدی وقرآن تعلیم گرفتی قریش گفتندی کہ محمد ازین غلام کلامے مے آموزدوباما میگویند ۔

मुंशी साहब कहते हैं कि हमारे ज़माने के ईसाई ऐसे ऐब लगाते हैं देखो ये उस ज़माने के ईसाईयों की बात है या ऐन मुहम्मद साहब के मुँह पर क़ुरैश का बयान था? और फिर मुंशी साहब किस तरह कहते हैं कि ऐसी बात का कभी चर्चा नहीं हुआ क्या मुंशी साहब ने क़ुरआन नहीं पढ़ा? नाज़रीन आप ही इन्साफ़ करें।

(व) नाज़रीन को ये भी मालूम हो जाये कि मुहम्मद साहब ने इन क़ुरैश के मोअतरिज़ों (यानी एतराज़ करने वालों) को जवाब भी दुरुस्त नहीं दिया बल्कि फ़त्ह मोअतरिज़ों (यानी जीत एतराज़ करने वालों) की रही थी। एतराज़ ये था कि इस शिकस्ता ज़बान नस्रानी (ईसाइ) से मज़ामीन कुतुब मुक़द्दसा के हज़रत सुनते हैं और अपनी फ़सीह अरबी में हमें सुनाते हैं। जवाब ये मिला कि उस (ईसाइ) की ज़बान ग़ैर फ़सीह है पर हम फ़सीह क़ुरआन सिखलाते हैं ये तो वो पहले ही कहते थे कि मज़ामीन उस के हैं इबारत हज़रत की है और इसी का इक़रार जवाब में भी हुआ।

दूसरा अम्र

“मुल्क-ए-शाम को जाना कई बार” ये बात झूट है मगर दो बार जाना साबित है तो भी जल्दी आए थे और सुर्यानी ज़बान ना जानते थे पस ऐसी जल्दी और इस क़द्र उलूम क्योंकर सीख लिए?

जवाब

जाना तो कई बार हुआ है पर ख़ैर मुंशी साहब दो सफ़र तो मानते हैं। और हम ये नहीं कहते कि वहां जा के उलूम पढ़े थे क्योंकि मुहम्मद साहब के क़ुरआन में कुछ उलूम और मआरिफ़ नहीं हैं मगर बात ये है कि अहले-किताब से कुछ मौक़ा बातों का मिला और कुछ-कुछ सुना भी और ग़लत पलत याद भी रहा। मगर ये कहना कि सुर्यानी ना जानते थे भला सुर्यानी की क्या हाजत (ज़रुरत) थी? हिन्दुस्तान के देहाती लोग शहरों के मुसलमानों में आते हैं अगरचे अरबी नहीं जानते तो भी इस्लाम की बातें अपनी ज़बान में इन से सुन जाते हैं जिस ज़बान से मुहम्मद साहब ब्योपार का मुआमला उन से कर सकते थे उसी ज़बान से उन की तक़रीर भी सुन सकते थे और इतनी ज़्यादा हुज्जत की क्या ज़रूरत है घर में सिखलाने वाली और तौरेत और इंजील भी मौजूद थी जिसका ज़िक्र ऊपर हो गया है।

तीसरा अम्र

यमन जाना क़तअन ग़ैर-सहीह है क्योंकि अगरचे डाक्टर वेल लिखते हैं कि 16 बरस की उम्र में मुहम्मद साहब अपने चचा ज़ुबैर के साथ यमन को गए मगर इस पर नेग्र साहब कहते हैं कि मुझे इसकी कोई सनद नहीं मिलती पस नतीजा ये हुआ कि यमन में जाना क़तअन ग़लत है।

जवाब

इस पर नेग्र साहब का क़ौल शायद मुंशी साहब ने वही समझा है जिस पर क़तीअत का फ़त्वा देते हैं। साहब इस पर नेग्र साहब की किताब और डाक्टर वेल वग़ैरा की किताब की निस्बत ज़्यादा मोअतबर सीरत-उन्नबी है वहां लिखा है :-

دسافرصلعم الے الیمن وعمرہ بضع عشرۃ سنتہ وکان مُعہ فی ذلک السفر عمہ الزبیر

यानी मुहम्मद साहब ने सफ़र किया यमन की तरफ़ और इस सफ़र में उनका चचा ज़ुबैर साथ था और दस बरस से ऊपर की बरस उन की उम्र थी। लफ़्ज़ बज़अ (بضع) आप लोग कहते हैं कि नौ तक हद रखता है पस क्या मुज़ायक़ा है कि 16 बरस की उम्र में गए हों?

फिर इसी किताब के सफ़ा 63 के आख़िर में है :-

نقلہ الجلی فی سیرہ وذکر فہیا ان خدیجتہ استاجرت النبی ایضا سفر تین الی جرش و ہوموضع بالیمن و ہو المراد بقول بعضہم سوق حباشیتہ وذلک یفید انہ صلعم سافر لہا سفرات

यहां से साबित है कि जवानी में भी यमन के सफ़र को गए थे हल्बी (حَلبی) से ज़्यादा इस पर नेग्र साहब का क़ौल नहीं है जिस पर क़तीअत का फ़तवा मुंशी साहब देते हैं।

चौथा अम्र

मास्टर राम चन्द्र साहब बार-बार लिखते हैं कि ख़दीजा ने तौरेत इंजील पढ़ी थी और हवाला तबरी का देते हैं। मगर म्यूर साहब इस पर नेग्र साहब का क़ौल यूं नक़्ल करते हैं कि ये मज़्मून तबरी के फ़ारसी तर्जुमें में है ना अरबी में।

जवाब

ये कुछ बड़ी बात नहीं है और ना इस वक़्त मेरे पास तबरी मौजूद है कि अरबी में देखकर तस्दीक़ या तक़्ज़ीब करूं बिलफ़र्ज़ अगर तर्जुमा फ़ारसी में है तो वो तर्जुमा भी आप ही लोगों का है मास्टर साहब ने तर्जुमा नहीं कर लिया है। इस में कुछ शक नहीं है कि ख़दीजा को बहुत सी बातें अहले-किताब की मालूम थीं और इस के बाअज़ अहबाब (मिलने जुलने वाले) नस्रानी थे ख़्वाह इस ने पढ़ा या ना पढ़ा हो इस से क्या निकलता है बे पढ़े आदमी भी दीन की मोटी बातों से अक्सर वाक़िफ़ होते हैं।

फिर ये भी मुंशी साहब कहते हैं कि सातवीं या ग्यारहवीं सदी में कलाम के तर्जुमे अरबी में हुए हैं पहले अरबी में तर्जुमा ना था इस का जवाब ये है कि अगरचे बाला-इस्तआब तर्जुमा पहले ना हो मगर किसी किसी टुकड़े के तर्जुमे ज़रूर थे और यहूदी व ईसाई लोग अरब में भी रहते थे बल्कि इस मुल्क में कहीं कहीं ज़मींदार और जागीरदार भी थे ख़ुद मक्का और मदीना में भी रहते थे ये नामुम्किन है कि अपने दीन की बातें अपनी ज़बान में कुछ भी ना रखते हों और वह जो मदीना में जाकर यहूदीयों के मुक़द्दमें के वक़्त हज़रत ने तौरेत मँगवाई थी और उमर को तौरेत पढ़ता देखकर ग़ुस्सा किया था वो क्या था?

पांचवां अम्र

वर्क़ा बिन नवाफिल ईसाई ने मुहम्मद साहब को कुछ ताअलीम नहीं दी।

जवाब

जिस क़द्र ताअलीम देना हदीसों में लिखा है इस क़द्र तो ज़रूर ही दी थी और इस पर हमारा ज़ोर नहीं है कि उस्ताद बन कर उसने हज़रत को सबक़ पढ़ाया हाँ बुज़ुर्गों की सोहबत से जिस क़द्र फ़ायदा कभी-कभी की मुलाक़ात में पढ़हे और अनपढ़हे लोग भी हासिल किया करते हैं उसी क़द्र अपनी इस्तिदाद (सलाहियत) के मुवाफ़िक़ मुहम्मद साहब ने भी वर्क़ा बिन नवाफिल बुज़ुर्ग ईसाई की बातें सुन कर हासिल किया था और ये हमारा बयान सैर-व-हदीस की किताबों के मुवाफ़िक़ है। मुंशी साहब बे-

छटा अम्र

बहीरा राहिब अरब में कभी नहीं आया। इस पर नेग्र साहब का इस्तिदलाल फ़िक़्रह :-

(ردہ ابو طالب معہ) से बातिल है हाँ अरसा क़लील (थोड़े वक़्त) तक हज़रत ने बहीरा राहिब से मुलाक़ात की थी इस अरसा क़लील (थोड़े वक़्त) की मुलाक़ात में वो राहिब सारे क़ुरआन की ताअलीम क्योंकर कर सकता?

जवाब

कोई नहीं कहता कि सारे क़ुरआन की ताअलीम उसने दी है मगर ये कहते हैं कि कुछ-कुछ बातें इस से भी सुनीं और वो क़ुरआन की तालीफ़ में आईं।

सातवाँ अम्र

सलमान फ़ारसी हिज्रत के बाद मदीना में आकर मुसलमान हुआ था। रावडेल साहब कहते हैं कि बहिश्त की बातें इस ने बतलाएं थीं ये ग़लत है क्योंकि हिज्रत से पहले मुहम्मद साहब ने बहिश्त का ज़िक्र सुनाया था।

जवाब

मैं नहीं कहता कि बहिश्त का ज़िक्र सलमान फ़ारसी ने सिखलाया बल्कि मैं जानता हूँ कि बहिश्त की बातें जो हज़रत ने सुनाएं वो नफ़्से अम्मारा (दिल की ख्वाहिश) की सिखलाई हुई थीं क्योंकि उनका बहिश्त हर नफ़्सानी आदमी की ख़्वाहिशों के मुताबिक़ तज्वीज़ हुआ है। सलमान फ़ारसी ने भी कुछ मदद की होगी और अपने मुल्क फ़ारस के ख़यालात तज़्किरतन या सलाहन कुछ सुनाए होंगे पर मेरा ये बयान नहीं है। मेरा बयान तमाम जहान के सामने यही है कि नफ़्से अम्मारा ने नफ़्सानी बहिश्त तज्वीज़ किया है और हरगिज़ ऐसा बहिश्त ख़ुदा का नहीं है। वहां पर हरगिज़ हम लोग जाना भी पसंद नहीं करते।

आठवां अम्र

ये कहना कि बाअज़ ग़ुलामों ने सिखलाया है ये भी ग़लत है क्योंकि ग़ुलाम लड़के थे जब पकड़े आए जवानी में लड़कपन की बातें भूल गए थे।

जवाब

मुंशी साहब की इसी बात में बड़ी कोशिश है कि नहीं सिखलाया मगर जनाब मुंशी साहब ज़रूर सिखलाया है। अम्र अव्वल के जवाब पर फिर ग़ौर फ़रमाईए। मुंशी साहब कहते हैं कि ग़ुलाम जब पकड़े आए तब वो लड़के थे पर ये कहाँ से साबित हुआ? जवान लोग भी बल्कि बाअज़ वक़्त बुड्ढे आदमी भी और लड़के भी पकड़े आते थे पर ये ग़ुलाम “लड़के” ही थे जब पकड़े आए इस का सबूत क्या है? दूसरा ये कि जवानी में लड़कपन की बातें भूल जाया करते हैं ये कैसी बात है साहब बुढ़ापे तक बल्कि मौत तक भी नहीं भूलते शायद मुंशी साहब लड़कपन की बातों को भूल गए होंगे नाज़रीन आप इन्साफ़ कर लें कि वो ग़ुलाम पढ़हे हुए आदमी थे और किताबें भी पास रखते थे और पढ़कर हज़रत को सुनाते भी थे पर इसके क्या मअनी हैं कि भूल थे?

नवां अम्र

मुहम्मद साहब का दीने मसीही से इस्तिफ़ादा (फायदा हासिल) करना भी बातिल सनद है क्योंकि उस ज़माना की मसीहीय्यत बुत-परस्ती से कम ना थी।

जवाब

साहब दीने मसीही के अक़्वाल वही थे जो इस वक़्त हैं मगर उन के साथ रिवायतों और हदीसों की मकरूह ताअलीम के सबब कुछ तस्वीर बुत-परस्ती की भी राइज हो गई थी और लोग ऐसे थे जैसे इस वक़्त मुहम्मदियों में बिद्दतीयों या पीर-परस्तों का फ़िर्क़ा है यानी जो हाल रोमन कैथोलिक लोगों का इस वक़्त है वही हाल उस वक़्त भी था आप प्रोटैस्टैंट लोगों की हालत को उस वक़्त की रोमन कैथोलिक की हालत से मुक़ाबला करके ये कहते हैं मगर इस तक्लीफ़ की क्या ज़रूरत है, रोमन कैथोलिक अब तक कस्रत से मौजूद हैं और उसी हालत में भी हैं। और मुहम्मद साहब ने जो कुछ दीने ईसाई का बयान क़ुरआन में लिखवाया है या अपनी हदीसों में सुनाया है वो सब बयान मुवाफ़िक़ है इन्हीं रोमन कैथोलिक की हालत की। पस् ज़रूर उन से इस्तिफ़ादा किया गया देखो मुंशी साहब वजह सबूत को वजह नफ़ी बनाते हैं और इन्साफ़ नहीं करते।

दसवाँ अम्र

नज़्म क़ुरआन तख़ालुफ़ तनाक़ुज़ (आपसी टकराव व इख्तालाफत) से बच कर बाहम तौफ़ीक़ व तत्बीक (एक मत) दिखलाती है इस से साबित है कि उस की तस्नीफ़ में किसी की शराकत (शिरकत) ना थी। इस दलील को मुंशी साहब एक निहायत उम्दा और गहरी दलील बताते हैं और इस पर ख़ातिमा करते हैं।

जवाब

क़ुरआन की नज़्म बेरब्त (बेतर्तीब) है और वो हदीसों से रब्त (तर्तीब) पाने की बहुत ही मुहताज है और हदीसें हर फ़िर्क़े के पास जद्दी (यानी एक दुसरे के ख़िलाफ़) हैं हर फ़िर्क़ा अपनी हदीसों के मुवाफ़िक़ उस की इबारत को फेर कर एक दूसरे के ख़िलाफ़ बोलता है और इसी वास्ते शीया लोग इस की नज़्म को नज़्म उस्मानी बतला के क़ुबूल नहीं करते इसके सिवा क़ुरआन की सारी इबारत की खूबियां और तख़ालुफ़ व तनाकज़ (आपसी इख्तालाफात व टकराव) हिदायत-उल-मुस्लिमीन के आख़िरी फसलों में दिखलाते भी गए हैं और उनका तताबुक़ बुदून तावीलात व क़रीबा और बईदा के हो नहीं सकता और मुंशी साहब ने अब तक उन मेरी फ़सलों का जवाब भी नहीं दिया है जिससे तसल्ली हो जाए कि बुदून तावीलात बईदा की वो तनाक़ुज़ रफ़ा हो गया है पस इसलिए ये बयान मुंशी साहब का बातिल है बल्कि तनाक़ुज़ (इख्तिलाफ़) है और जब है तो शराकत (शिरकत) भी साबित है बमूजब बयान मुंशी साहब के।

इस के बाद मुंशी साहब फ़रमाते हैं कि तिलका अश्रह कमीला (تلک عشرہ کا ملہ ) यानी ये दस अम्र दस दलीलें कामिल हैं मुहम्मद साहब की निस्बत मैं कहता हूँ कि ये तो निहायत नाक़िस (कमतर अधूरी) और मुहमल (बेमतलब) बातें हैं और इनका बुतलान (बातिल और ग़लत होना) इन्हीं चंद औराक़ (सफहों) में साबित हो गया है हर मुंसिफ़ (इन्साफ करने वाले) मुसलमान के नज़्दीक भी। पस इन दस उमूर को तिलक अशराअ बातिला (تلک عشرہ باطلہ ) कहना चाहीए। हाँ एक बात सच्च है कि जिस क़िस्म के मुहम्मद साहब नबी कामिल हैं इसी क़िस्म के ये उमूर अशराअ भी कामिल हैं।

16 तअ्लीक़

इमाद-उद्दीन ने अपनी तवारीख़ के आख़िर में जो एक फ़स्ल ख़साईस मुहम्मदियाह की निस्बत लिखी है ये भी अच्छा नहीं किया क्योंकि ये हदीस की बातें हैं।

16 तक़्लीअ

साहब मैं भी जानता हूँ और सब नाज़रीन भी जानते हैं कि ये हदीस की बातें हैं जैसे सारी तवारीख़ भी हदीस की बातें हैं। मगर मैं ये कहता हूँ कि आपके बुज़ुर्गों ने मुहम्मद साहब की ख़साईस यूं लिखी हैं और आप के बुज़ुर्ग इन ख़साईस को ख़साईसे मुहम्मदियाह बतलाते हैं अब आपको इख़्तियार है चाहें उन्हें ख़साईस मानें चाहें अपने इस्लाम की मुरम्मत करें पर मैंने तो आपकी किताबों में से नक़्ल किया है।

हासिल-ए-कलाम

तवारीख़ मुहम्मदी में सब कुछ दुरुस्त लिखा हुआ है जैसे मुसलमानों की सब तवारीख़ों में भी मज़्कूर है। और जिस क़द्र एतराज़ात तवारीख़ में बंदे ने लिखे हैं मुंशी साहब ने किसी एक बात का भी जवाब नहीं दिया बेफ़ाइदा ताअ्लीक़ात लिखी उन की सब तअलीक़ीन नाकारा हैं। और ईसाई लोग जो कुछ मुहम्मद साहब की निस्बत लिखते और बोलते हैं सब दुरुस्त और बजा (सहीह) है। मगर मुहम्मदी लोग फ़िक्र नहीं करते और अगर फ़िक्र भी करते हैं तो मह्ज़ ये फ़िक्र करते हैं कि किस तरह मुहम्मदी नबुव्वत साबित करें? हक़ीक़ीत में ख़्वाह साबित हो या ना हो। जहां तक हो सके तरफ़दारी की जाये ख़्वाह मुनासिब दलाईल से ख़्वाह नामुनासिब दलाईल से पस उन लोगों को हक़ जोइ मंज़ूर नहीं है पर तरफ़दारी मंज़ूर है हाँ उन में भी बाअज़ रूहें ऐसी हैं जो ख़ुदा से डरती हैं और हिदायत की तालिब हैं उन्हीं पर ख़ुदा की बरकत भी होती है। अब जो कोई अपनी जान बचाना चाहता है वो इन मौलवियों और मुंशियों और झगड़ालूँउन की तक़रीरों से किनारा-कश (अलग) हो के सब कुछ अपने हौसले के मुवाफ़िक़ बे तरफ़दारी के इन्साफ़ से आप दर्याफ़्त करे या और ईसाईयों की तक़रीरों को इन साहिबों की तक़रीरों को भी अपने दिली इन्साफ़ के तराज़ू में तोले और अपनी जान को बर्बाद ना करे। क्योंकि ईसाई दीन ज़रूर ख़ुदा तआला का दीन है और सब मज़्हब दुनिया में बातिल और बनावटी हैं। मेरी दुआ जनाब मुंशी साहब के हक़ में और सब नाज़रीन के लिए भी यही है कि यसूअ मसीह ख़ुदा के बेटे का फ़ज़्ल तुम सब के शामिल-ए-हाल हो जाए ताकि सब ज़िंदगी पाएं और ख़ुदा सबकी आँखें खोल दे कि उस को जो बरहक़ है पहचानें और उस के सामने सज्दा करेंआमीन।